PM मोदी से दिल्ली में मिले सुखबीर बादल: पंजाब में दोबारा अकाली-BJP गठजोड़ के संकेत; केजरीवाल बोले- ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे – Chandigarh News


पीएम नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल।- फाइल फोटो

शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल शुक्रवार सुबह दिल्ली पहुंचे और पार्लियामेंट हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 40 से 45 मिनट तक मुलाकात की। पीएम से मीटिंग से पहले सुखबीर बादल की हरियाणा CM नायब सैनी से भी मुलाकात हुई थी।

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दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद अकाली दल और भाजपा गठबंधन की चर्चा होने लगी है। पंजाब विधानसभा चुनाव में तकरीबन चार-पांच महीने का टाइम बचा है। माना जा रहा है कि दोनों दलों के शीर्ष नेताओं की मुलाकात के बाद अब गठबंधन फाइनल हो सकता है।

इधर, मोदी-सुखबीर की मुलाकात पर आम आदमी पार्टी (AAP) सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने तंज कसा-

ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे……तो क्या चन्दा चोर पार्टी और बेअदबी पार्टी का गठबंधन हो रहा है?

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केजरीवाल के इस तंज पर सुखबीर बादल ने कहा- 2022 से पहले AAP ने दावा किया था कि आप पंजाब में फल-फूल रहे ₹20,000 करोड़ के अवैध खनन को तुरंत बंद करवा देंगे और आज NGT के आदेश ने साबित कर दिया है कि आपकी सारी गारंटी गटर में फेंकने लायक हैं।

पंजाब की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा- मुझे पहले से लगता था कि यह इकट्‌ठे होंगे। हालांकि कोई बदलाव नहीं होगा। मुझे पता था कि टूटी बाजू इकट्ठी होंगी, लेकिन यह रहेंगी टूटी हुई ही।

अकाली-भाजपा ने मिलकर 3 बार सरकार बनाई…

  • पंजाब में अकाली दल और BJP का गठबंधन वर्ष 1996 में हुआ और तकरीबन 25 साल चला। ये पंजाब की सियासत के सबसे सफल सियासी गठजोड़ों में से एक रहा।
  • दोनों पार्टियों ने गठबंधन के महज एक साल बाद वर्ष 1997 में पहली गठबंधन सरकार बनाई। दोनों पार्टियों को 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव में भी पूर्ण बहुमत मिला।
  • पंजाब के पूर्व सीएम और सुखबीर बादल के पिता स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल अकाली-BJP गठबंधन को नोंह-मास के रिश्ते जैसा बताया करते थे। पंजाबी के इस मुहावरे का अर्थ होता है- अंगुली के नाखून और स्किन की तरह आपस में जुड़ा होना यानि ऐसा संबंध जिसे कभी अलग नहीं किया जा सकता।

अकाली-भाजपा गठबंधन की कामयाबी की 3 वजहें

1. पॉलिटिकल एक्सपर्ट इंजीनियर पवनदीप शर्मा ने बताया कि अकाली-भाजपा गठबंधन की कामयाबी की दो वजह थीं। पहली वजह ये कि दोनों दलों की अलग-अलग वोट बैंक में मजबूत पैठ थी। अकाली दल की रूरल बेल्ट और पंथक इलाकों में पकड़ थी, जबकि भाजपा शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत थी।

2. उन्होंने बताया कि दूसरी वजह थी सीट शेयरिंग फॉर्मूला। गठबंधन के तहत अकाली दल 94 और भाजपा पंजाब विधानसभा की 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। दोनों पार्टियां अपने मजबूत जनाधार वाले इलाकों में उतरती और कार्यकर्ताओं का भी एक-दूसरे को साथ मिलता था। दोनों दलों के वोट बंटने की बजाय एक जगह पोल होते।

3. पवनदीप शर्मा ने बताया कि इसी समीकरण के बूते 2012 में गठबंधन ने वो कर दिखाया जो पंजाब के इतिहास में उससे पहले कभी नहीं हुआ था। दोनों दलों ने तब 68 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की। इससे पहले पंजाब में कोई पार्टी या गठबंधन अपनी सरकार रिपीट नहीं कर पाया था।

वर्ष 2020 में गठबंधन टूटने के बाद दोनों के वोट बंट गए और 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां सिंगल डिजिट में सिमट गईं।

भाजपा-अकाली गठबंधन टूटने का विरोधियों पर असर

  • AAP को मिला सबसे बड़ा फायदा: पॉलिटिकल एक्सपर्ट डॉ कृष्ण कुमार रत्तू ने बताया कि भाजपा-अकाली गठबंधन टूटने से 2022 में पंजाब की राजनीति का पारंपरिक मुकाबला कमजोर हुआ। इसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को मिला, जिसने खुद को तीसरे विकल्प से सत्ता के दावेदार के रूप में स्थापित किया।
  • कांग्रेस का वोट समीकरण बिगड़ा: डॉ कृष्ण कुमार रत्तू ने बताया कि 2017 में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में मदद करने वाला अकाली विरोधी वोट 2022 में बंट गया। AAP के उभार ने कांग्रेस को मुख्य मुकाबले से बाहर कर दिया।
  • विपक्षी वोटों का समीकरण बदला: भाजपा और अकाली दल के अलग-अलग लड़ने से सत्ता विरोधी वोट एकजुट नहीं रहा। AAP ने किसान आंदोलन और बदलाव की लहर का फायदा उठाकर बड़ा जनादेश हासिल किया।
  • 2027 में गठबंधन हुआ तो चुनौती बढ़ेगी: अगर भाजपा-अकाली दल फिर साथ आते हैं तो AAP और कांग्रेस के सामने मुकाबला त्रिकोणीय से ज्यादा सीधा और कठिन हो सकता है।

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