चंडीगढ़ प्रशासन की लापरवाही पर कोर्ट सख्त: जुर्माना जमा न करने पर जवाब दाखिल करने का अधिकार छीना,अब एकतरफा सुनी जाएगी देरी माफी अर्जी – Chandigarh News
चंडीगढ़ जिला अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से न्यायिक प्रक्रिया में बरती गई लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (एडीजे) अरविंद कुमार की अदालत ने कहा कि जब किसी पक्ष पर अदालत लागत लगाती है तो उसका भुगतान करना केवल औपचारिकता नहीं बल्कि कानूनी बाध्यता होती है। अदालत ने पाया कि सब डिविजनल मजिस्ट्रेट की ओर से न तो समय पर जवाब दाखिल किया गया और न ही पहले लगाए गए 1000 रुपए के खर्चे जमा किए गए। इसके चलते अदालत ने प्रतिवादी पक्ष का धारा-5 लिमिटेशन एक्ट के तहत दायर आवेदन के खिलाफ जवाब दाखिल करने का अधिकार ही समाप्त कर दिया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त 2026 तय की है, जिस दिन देरी माफी आवेदन पर विचार किया जाएगा और यह निर्णय लिया जाएगा कि अपील या याचिका में हुई देरी को माफ किया जाए या नहीं। जानिए पूरा मामला क्या था यह मामला जोगिंदर कुमार नागपाल बनाम सब डिविजनल मजिस्ट्रेट से जुड़ा हुआ है। अदालत में सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर देरी माफी आवेदन पर प्रशासन की ओर से अब तक जवाब दाखिल नहीं किया गया था। इससे पहले भी अदालत ने जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया था, लेकिन निर्धारित अवधि में जवाब न आने पर प्रशासन पर 1000 रुपए की लागत लगाई गई थी। इसके बावजूद न तो जवाब दाखिल हुआ और न ही अदालत के आदेशानुसार लागत जमा कराई गई। अपने आदेश में एडीजे अरविंद कुमार ने स्पष्ट कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 35-बी के तहत यदि अदालत किसी पक्ष पर लागत लगाती है तो उसका भुगतान किए बिना वह पक्ष आगे की कार्यवाही में अपना बचाव जारी नहीं रख सकता। अदालत ने कहा कि जब प्रतिवादी पक्ष ने लागत जमा नहीं की, तो उसे धारा-5 लिमिटेशन एक्ट के तहत दायर आवेदन का विरोध करने या उस पर जवाब दाखिल करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। जबाव दाखिल करने से पहले दिए मौके अदालत ने कहा कि प्रशासन को जवाब दाखिल करने के लिए पहले भी कई मौके दिए गए थे, लेकिन उसने न समय पर जवाब जमा किया और न ही अदालत द्वारा लगाया गया 1000 रुपये का जुर्माना भरा। इसलिए अब उसे इस मामले में अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया जाएगा। ऐसे में अब उसके बचाव का अधिकार समाप्त किया जाता है और धारा-5 लिमिटेशन एक्ट की अर्जी पर उसका कोई जवाब रिकॉर्ड पर नहीं लिया जाएगा। इस आदेश के बाद याचिकाकर्ता को राहत मिली है, क्योंकि अब देरी माफी की अर्जी पर प्रशासन की ओर से कोई लिखित जवाब अदालत के रिकॉर्ड पर नहीं होगा।
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