पीएयू में चल रही खुली पाठशाला में 25 बच्चे, अब तक 150 से अधिक बच्चों को शिक्षा से जोड़ा – Ludhiana News
पुशांत मोदगिल | लुधियाना एक तरफ गुरुद्वारा साहिब से आती गुरबाणी की सुरीली आवाजें, दूसरी तरफ खुली हवा में कॉपी-किताब लिए बैठे वो बच्चे जिनके हाथों में कभी किताब की जगह मिट्टी और मांगकर खाने की मजबूरी हुआ करती थी। पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू) परिसर में पिछले 12 सालों से चल रही यह खुली पाठशाला किसी सरकारी योजना का हिस्सा नहीं बल्कि एक इंसान के दिल से उठी आवाज का नतीजा है। यही बात इस पूरे सामाजिक प्रयास को बाकी सब से अलग और खास बनाती है। वह बच्चे खुली पाठशाला में पढ़ाई की अपना भविष्य बना रहे हैं। इस पूरे सामाजिक प्रयास की कहानी साल 2014 से शुरू होती है। पीएयू के एंटोमोलॉजी विभाग में कार्यरत सिमरजीत सिंह पंघेर ने बताया कि उस समय यूनिवर्सिटी परिसर में नए हॉस्टल का निर्माण कार्य चल रहा था। वहां काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चे कॉपियों की जगह हाथों में मिट्टी और बालू लिए घूमते रहते थे। सिमरजीत सिंह ने इन बच्चों को इस आदत से हटाकर शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने की सोची। शुरुआत में उन्होंने महज 5 बच्चों को इकट्ठा किया। उन्हें पढ़ाई से जोड़ने के लिए कभी प्यार का सहारा लिया तो कभी खेल-खेल में बिस्कुट व खाने-पीने की चीजों से पेड़ की छांव तले बिठाना शुरू किया। धीरे-धीरे ये बच्चे अक्षर पहचानने लगे तो इस टीम ने इनके आधार कार्ड बनवाने का काम किया ताकि सरकारी स्कूलों के जरिए मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सके। इस खुली पाठशाला की सबसे खूबसूरत और प्रभावशाली बात इसका समर्पित टीचिंग स्टाफ है। यहां बच्चों को पढ़ाने के लिए कोई पेशेवर या वेतनभोगी शिक्षक नहीं आते बल्कि यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे देश के होनहार छात्र खुद आगे आकर अपनी सेवाएं देते हैं। जब ये छात्र शाम के समय गुरुद्वारा साहिब में नतमस्तक होने आते हैं तो खुली हवा में पढ़ते इन बच्चों को देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते और खुद ब्लैकबोर्ड का चॉक थाम लेते हैं। मौजूदा समय में यूनिवर्सिटी के तीन होनहार छात्र अपनी बेहद कठिन और व्यस्त पढ़ाई के बीच से रोज़ समय निकालकर इन बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं। इनमें रीना ठाकुर एमएससी इन बायोटेक्नोलॉजी के द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं, प्रभदीप सिंह बीएससी एग्रीकल्चर के तृतीय वर्ष में पढ़ाई कर रहे हैं और गुरवीर सिंह गडवासु से बीएससी फिशरीज साइंस के द्वितीय वर्ष के छात्र हैं। इनसे पहले भी यूनिवर्सिटी के कई पीएचडी स्कॉलर्स लंबे समय तक इस मिशन का हिस्सा रह चुके हैं। समय के साथ यूनिवर्सिटी के हॉस्टल बनकर तैयार हो गए और वहां काम करने वाली पुरानी लेबर आगे मूव कर गई, लेकिन यह खुली पाठशाला कभी बंद नहीं हुई। अब तक इस खुली पाठशाला से पढ़कर करीब 150 से अधिक बच्चे बुनियादी शिक्षा लेकर आगे बढ़ चुके हैं। वर्तमान में भी यहां करीब 25 बच्चे नियमित रूप से पढ़ रहे हैं। अब पीएयू कैंपस के अलावा बाहर के इलाकों से भी जो जरूरतमंद छात्र हैं वे भी इस खुली पाठशाला की जानकारी मिलने पर यहां आकर नियमित रूप से कक्षाएं ले रहे हैं। इस पूरी मुहिम में गुरुद्वारा साहिब की प्रबंधकीय कमेटी का विशेष सहयोग रहता है। बच्चों के बैठने की कुर्सियां, ब्लैकबोर्ड, अलमारी और नई कॉपियां व स्टेशनरी का सारा सामान गुरुद्वारा साहिब परिसर के अंदर ही सुरक्षित रखा जाता है। सिमरजीत सिंह पंघेर बताते हैं कि इस खुली पाठशाला का मकसद सिर्फ बच्चों को बुनियादी ज्ञान देना नहीं बल्कि उन्हें अच्छी शिक्षा के लिए तैयार करना भी है। शुरुआती पंजाबी और बुनियादी ज्ञान देने के बाद इन बच्चों का दाखिला पीएयू के ही सरकारी स्कूल में करवा दिया जाता है। इस प्रयास की सबसे बड़ी सफलता का चेहरा कंचन नाम की बच्ची है। कंचन कभी इसी पेड़ की छांव तले पहली बार वर्णमाला सीखने आई थी और आज वह अपनी मेहनत के दम पर 12वीं कक्षा में पढ़ रही है। कंचन का परिवार अब यूनिवर्सिटी परिसर से काफी दूर शिफ्ट हो चुका है लेकिन वह आज भी हफ्ते में दो-तीन दिन विशेष तौर पर खुली पाठशाला में आती है।
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