पंजाब निकाय चुनाव नतीजे: बिना गठबंधन अकाली दल, BJP की राह मुश्किल; जानिए AAP और कांग्रेस के लिए 2027 के क्या संकेत – Ludhiana News

पंजाब निकाय चुनाव नतीजे:  बिना गठबंधन अकाली दल, BJP की राह मुश्किल; जानिए AAP और कांग्रेस के लिए 2027 के क्या संकेत – Ludhiana News


पंजाब में निकाय चुनाव के नतीजों में AAP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 8 निगम समेत 104 निकायों के 1977 वार्डों में से AAP ने करीब साढ़े 900 वार्ड जीते। कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही, लेकिन वार्ड 400 के करीब ही जीत सकी। हालांकि कपूरथला निगम में बहुमत पाने में

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अकाली दल की हालत बुरी रही, वह करीब 200 वार्डों में जीता जरूर, लेकिन मुकाबले में नजर नहीं आया। बंगाल में जीत से उत्साहित भाजपा के लिए नतीजों से अच्छी खबर ये है कि उनका प्रदर्शन सुधरा है। 2021 में 38 के मुकाबले उन्हें करीब 170 के करीब वार्डों में जीत मिली। अबोहर नगर निगम में भी बहुमत मिला।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि इन चुनावों के 2027 के लिहाज से क्या मायने हैं?, नतीजों ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में किस पार्टी के लिए क्या संकेत दिए। ये जानने के लिए पढ़ें पूरी रिपोर्ट…

AAP: फीलगुड ठीक लेकिन मुगालते में रहे तो नुकसान होगा निकाय चुनावों में बड़ी जीत के बाद AAP नेता अपनी पीठ थपथपा रहे हैं लेकिन उनका प्लस पॉइंट ये भी था कि उनकी सरकार है। निकाय चुनाव में लोग सरकार वाली पार्टी को ही ज्यादा वोट देते हैं ताकि डेवलपमेंट न रुके। पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा का कहते हैं- इसे AAP की वनसाइड विक्ट्री नहीं कह सकते।

वैसे भी, 2021 में कांग्रेस के अकेले 1199 वार्ड जीतने के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में 117 में से 18 सीटें जीत पाने का सबक AAP को भी याद रखना होगा। दूसरा इसमें सरकार से जुड़े लॉ एंड ऑर्डर, चुनावी वादे, बेअदबी का इंसाफ जैसे और मुद्दे नहीं थे। जनता जब इन मुद्दों पर आएगी तो AAP के लिए मुश्किल खड़ी होगी। इसलिए नेताओं को सावधान रहते हुए ग्राउंड लेवल पर काम करना होगा।

कांग्रेस: जमीन से गायब हुए तो 2027 में लोग बाय-बाय कर देंगे कांग्रेस इन चुनावों में 2021 में 1199 वार्ड के मुकाबले सीधे 400 के करीब आ गई। अकाली दल और भाजपा के आपसी बिखराव का फायदा भी कांग्रेस को नहीं मिला। कपूरथला में निगम में बहुमत दिलाने वाले कांग्रेस नेता व विधायक राणा गुरजीत स्पष्ट कर चुके हैं कि 2027 में जीत हासिल करनी है तो AC कमरों से बाहर निकलकर जमीन पर उतरना होगा।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा भी यही मानते हैं। उनका कहना है- अगर कांग्रेस के बड़े नेता अब भी जमीन पर नहीं उतरे, तो 2027 में जीत सपना ही रह जाएगी। गुटबाजी और अंदरूनी कलह ने पार्टी को पहले ही खोखला कर दिया है। चुनाव नतीजों से साफ है कि जनता विपक्ष के तौर पर कांग्रेस को ही देख रही है। मगर, कांग्रेस की समस्या यह है कि उनके नेता सिर्फ चुनावों के दिनों में ही ‘एक्टिव’ मोड में आते हैं।

अकाली दल: BJP से गठबंधन मजबूरी बनता जा रहा 2007 से 2017 तक 10 साल की रिकॉर्ड सरकार बनाने वाला अकाली दल अब भी हाशिए पर नजर आता है। 2021 के चुनाव में दूसरे नंबर की पार्टी बना अकाली दल इस बार 200 का आंकड़ा भी नहीं छू पाया। बेअदबी और उससे जुड़े गोलीकांड के बाद अकाली दल से लोगों का मोहभंग अभी भी बरकरार है। भाजपा से नाता तोड़ने के बाद भी हालात नहीं सुधर रहे।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट सीनियर जर्नलिस्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में तो पार्टी लगातार जनाधार खो रही है। पंथक और ग्रामीण वोट बैंक पर भी अब ‘आप’ और कांग्रेस ने डेंट मार दिया है। इन नतीजों ने अकाली दल को अहसास करा दिया कि भाजपा के बिना सत्ता में नहीं आ सकते हैं।

शिअद को सच स्वीकार करना होगा कि वे अकेले दम पर 2027 में सरकार नहीं बना सकते। उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में भाजपा के साथ गठबंधन की नौबत आती भी है, तो अकाली दल पंजाब में ‘बड़े भाई’ की भूमिका का दावा नहीं ठोक पाएगा। अब उसे भाजपा के सामने झुकना ही पड़ेगा।

भाजपा: समर्थन बढ़ रहा लेकिन अकेले दम पर सरकार मुश्किल भाजपा नेता इस बात पर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि उन्होंने पिछले चुनाव के मुकाबले बढ़त हासिल की है और करीब 160 वार्डों में कमल खिलाने में कामयाब रहे हैं। किसान आंदोलन के दौर में भाजपा को पंजाब के गांवों और कस्बों में घुसने तक नहीं दिया जाता था। मगर, इस बार शहरों-गांवों में 160 से ज्यादा वार्ड जीते हैं। भाजपा के लिए यह अच्छा संकेत जरूर है लेकिन इतना भ्पाी नहीं कि 2027 में अकेले दम पर सरकार बना लेंगे।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि अकेले चुनाव लड़कर 2027 में ‘भाजपा सरकार’ बनाने के दावे हवाई किले बनाने जैसे हैं। इन नतीजों ने भाजपा को समझा दिया है कि पंजाब की सियासत की डगर इतनी आसान नहीं है। अगर भाजपा को 2027 में पंजाब में सत्ता में आना है, तो उसे भी अकाली दल के साथ गठबंधन के बारे में साेचना पड़ेगा।

दिग्गज नेताओं के इलाकों में कैसी परफॉर्मेंस, विस चुनाव में क्या होगा?

अमरिंदर सिंह राजा वडिंग (कांग्रेस अध्यक्ष): अमरिंदर सिंह राजा वडिंग अपने क्षेत्र गिद्दड़बाहा में लगातार चुनाव हार रहे हैं। वे पहले गिद्दड़बाहा का विधानसभा उपचुनाव हारे, फिर पंचायत चुनाव हारे और अब अपने ही क्षेत्र में नगर परिषद चुनाव भी हार गए। जब प्रदेश अध्यक्ष अपने ही गृह क्षेत्र में पार्टी को नहीं जिता पा रहे हैं, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में उनके नेतृत्व में कांग्रेस का मैदान में उतरना मुश्किल दिखाई देता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस इनके सहारे विधानसभा चुनाव में उतरेगी?

प्रताप सिंह बाजवा (नेता प्रतिपक्ष): प्रताप सिंह बाजवा विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं और खुद को 2027 में मुख्यमंत्री पद का प्रमुख दावेदार मानते हैं। इसके बावजूद वे अपने विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाली धारीवाल नगर काैंसिल में कांग्रेस को जीत नहीं दिला सके। अपने क्षेत्र में मिली इस हार के बाद 2027 में पार्टी के भीतर उनकी दावेदारी पर सवाल उठना तय है।

सुखजिंदर सिंह रंधावा (पूर्व उपमुख्यमंत्री): माझा इलाके के कद्दावर नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री व सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा बटाला नगर निगम में कांग्रेस को जीत की दहलीज पार नहीं करवा सके। रंधावा को भी पार्टी अध्यक्ष व मुख्यमंत्री चेहरे का दावेदार माना जाता रहा है। अब सवाल यही है कि क्या पार्टी 2027 में उन पर विश्वास करके उन्हें चुनाव में उतारेगी?

राणा गुरजीत सिंह: राज्य में विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद राणा गुरजीत सिंह ने फिर अपना लोहा मनवाया है। उन्होंने न केवल कपूरथला नगर निगम में कांग्रेस को जीत दिलाई, बल्कि उनके बेटे राणा इंदरप्रताप ने सुल्तानपुर लोधी में जीत दर्ज की। राणा गुरजीत पहले ही कह चुके हैं कि कमरों में बैठकर राजनीति नहीं हो सकती। इस शानदार प्रदर्शन के बाद 2027 के चुनाव में कांग्रेस को उन्हें मुख्य भूमिका देने पर विचार कर सकती है।

चरणजीत सिंह चन्नी (पूर्व मुख्यमंत्री): 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों सीटों से हारने के बाद चरणजीत सिंह चन्नी ने लगातार मजबूत वापसी की है। पहले उन्होंने जालंधर से लोकसभा चुनाव बड़े अंतर से जीता और अब जालंधर व चमकौर साहिब के पंचायत और निकाय चुनावों में कांग्रेस को बड़ी जीत दिलाई। इस निरंतरता के कारण वे 2027 के लिए मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत चेहरे के रूप में उभरे हैं।

सुनील जाखड़ (पूर्व भाजपा अध्यक्ष): सुनील जाखड़ ने अबोहर नगर निगम में भाजपा को जीत दिलाकर यह साबित कर दिया है कि पंजाब के मालवा क्षेत्र और हिंदू वोट बैंक के बीच उनका व्यक्तिगत प्रभाव बहुत मजबूत है। भाजपा यदि 2027 विधानसभा चुनाव में कोई जिम्मेदारी देती है तो वो पार्टी को आगे बढ़ा सकते हैं।

अश्वनी शर्मा (कार्यकारी अध्यक्ष): भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष अश्वनी शर्मा ने पठानकोट में पार्टी को बढ़त दिलाकर अपनी संगठनात्मक पकड़ का सबूत दिया है। माझा क्षेत्र के शहरी और हिंदू बहुल इलाकों में भाजपा के लिए 2027 के चुनाव में अश्वनी शर्मा एक अनिवार्य चेहरा बने रहेंगे।

सीएम भगवंत मान और अमन अरोड़ा: मुख्यमंत्री भगवंत मान और पार्टी अध्यक्ष अमन अरोड़ा ने अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी को बंपर जीत दिलाई है। इन नतीजों से स्पष्ट है कि सरकार के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी के दावों के बावजूद इन दोनों नेताओं की व्यक्तिगत साख जनता में मजबूत है। 2027 की चुनावी जंग में ‘आप’ इन्हीं दोनों के चेहरों को आगे रखकर उतरेगी।

हरसिमरत कौर बादल: अकाली दल के लिए सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरसिमरत कौर बादल पार्टी के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले बठिंडा नगर निगम में भी अकाली दल को जीत नहीं दिला सकीं। यह इस बात का साफ संकेत है कि पारंपरिक अकाली वोट बैंक अब पूरी तरह बिखर चुका है और 2027 से पहले नेतृत्व को अपनी पूरी रणनीति बदलनी होगी।

बिक्रम सिंह मजीठिया: पूरे पंजाब में अकाली दल के खराब प्रदर्शन के बीच बिक्रम सिंह मजीठिया मजीठा क्षेत्र में ‘आप’ और कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने में सफल रहे। इससे साफ है कि आज की तारीख में अकाली दल के पास मजीठिया ही एकमात्र ऐसे नेता बचे हैं जो आक्रामक राजनीति कर सकते हैं। 2027 में संगठन को दोबारा खड़ा करने में उनकी भूमिका सबसे अहम होगी।

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