197 मासूमों की जिंदगी बचाने वाला ‘पंघूड़ा’ गिन रहा अंतिम सांसें – Amritsar News

197 मासूमों की जिंदगी बचाने वाला ‘पंघूड़ा’ गिन रहा अंतिम सांसें – Amritsar News



भास्कर न्यूज | अमृतसर जिला प्रशासन की ओर से वर्ष 2008 में रेड क्रॉस सोसाइटी में जिस ‘पंघूड़े’ की स्थापना की गई थी, आज वह खुद सरकारी तंत्र की बेरुखी और घोर लापरवाही का शिकार हो चुका है। अनचाहे या नवजात बच्चों को सुरक्षित आश्रय देने और उनकी जान बचाने के उद्देश्य से शुरू किया गया यह पंघूड़ा अब अपनी पहचान ही खो चुका है। हालत यह है कि महीनों से चल रही प्रशासनिक अनदेखी के कारण आम लोगों को अब यह पता ही नहीं चल पाता कि आखिर यह पंघूड़ा किस कोने में स्थित है। रेड क्रॉस के मुख्य द्वार और बाहरी हिस्से को देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि यहां नवजातों के लिए कोई पंघूड़ा भी है। पहले जहां पंघूड़ा स्थापित था, वहां बाहर एक टोकरी लगाई गई थी। इसके साथ ही बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘पंघूड़ा’ लिखा गया था ताकि दूर से ही इसकी पहचान हो सके। आज वह पहचान पूरी तरह से साफ हो चुकी है। बाहर एक टोकरी तो लगी है, लेकिन वह किसलिए लगी है, वहां आने-जाने वाले किसी व्यक्ति को कुछ पता नहीं चल पाता है। जब कोई व्यक्ति रेड क्रॉस दफ्तर के बिल्कुल भीतर (अंदरुनी हिस्से) प्रवेश करता है, तब जाकर दीवार पर लिखे ‘पंघूड़ा’ शब्द से पता चलता है कि पालना यहां मौजूद है। रेड क्रॉस सोसाइटी के इस दफ्तर में जिले के आला अधिकारियों, प्रशासनिक अमले और वीआईपी लोगों का रोजाना आना-जाना लगा रहता है। बैठकें होती हैं, फाइलों पर हस्ताक्षर होते हैं, लेकिन पिछले कई महीनों से गायब हो चुके इस बोर्ड और पंघूड़े की दयनीय हालत पर किसी भी साहब की नजर नहीं पड़ी। यह साफ दर्शाता है कि कागजी दावों और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा अंतर है। रेड क्रॉस के कार्यकारी आनरेरी सेक्रेटरी सैमसन मसीह का कहना है कि पंघूड़े को अपग्रेड किया जाने का प्लान बनाया गया है। डिप्टी कमिश्नर की हिदायतों पर जल्द ही उसका काम शुरु होगा। आने वाले दिनों में पंघूड़ा एक अलग अंदाज में ही नजर आएगा। समाजसेवक राजेश सिदाना ने बताया कि यह कोई साधारण पालना नहीं है, बल्कि अमृतसर के इतिहास में मानवता की एक बड़ी मिसाल है। 2008 से लेकर अब तक पंघूड़ा लगभग 197 नवजात बच्चों की जान बचा चुका है। मजबूरियों के कारण जो लोग अपने नवजात बच्चों को झाड़ियों, नालों या असुरक्षित जगहों पर फेंक देते थे, वे इस पंघूड़े में बच्चों को सुरक्षित छोड़ जाते थे, जिन्हें बाद में कानूनी प्रक्रिया के तहत गोद दे दिया जाता था। इतने जीवनदायी प्रोजेक्ट को लेकर प्रशासन की सुस्ती हैरानजनक है। बाहर कुछ नहीं लिखा। रेडक्रॉस भवन के अंदर लिखा हुआ पंघूड़ा।



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