फाजिल्का का घंटाघर 87 वर्ष का हुआ: DC ने मनाया स्थापना दिवस, 1939 में ₹10,200 की लागत बना था, घड़ी ठीक कराने की मांग – Fazilka News
अंग्रेजों के जमाने में अस्तित्व में आई फाजिल्का की ऐतिहासिक विरासती इमारत ‘चौंक घंटाघर’ का आज 87वां स्थापना दिवस बेहद सादगी के साथ मनाया गया। इस विशेष अवसर पर आयोजित एक सादे कार्यक्रम में फाजिल्का की डिप्टी कमिश्नर (डीसी) अमरप्रीत कौर संधू मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुईं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस ऐतिहासिक घंटाघर का उद्घाटन 6 जून 1939 को हुआ था। उस समय इसके निर्माण पर महज 10,200 रुपये की लागत आई थी। पेड़ीवाल परिवार के अनुसार, इसका निर्माण दादा श्योपत राय पेड़ीवाल ने अपने चचेरे भाई राम नारायण पेड़ीवाल की याद में करवाया था, जिसके कारण इसका नामकरण राम नारायण पेड़ीवाल के नाम पर रखा गया है। इस इमारत की एक अनूठी विशेषता यह है कि जहाँ आज यह घंटाघर खड़ा है, वहाँ पहले एक कुआं हुआ करता था। आर्किटेक्ट ने उस कुएं को बंद किए बिना, घंटाघर की नींव को कुएं जितनी ही गहरी रखकर इसका ढांचा तैयार किया था।
पाकिस्तान के लायलपुर से है खास कनेक्शन 95 फीट ऊंचे इस घंटाघर का सीधा संबंध सरहद पार पाकिस्तान से भी है। इस इमारत को बनाने वाले आर्किटेक्ट और राजमिस्त्री ने ठीक ऐसा ही एक घंटाघर पाकिस्तान के लायलपुर (अब फैसलाबाद) में भी बनाया था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि फाजिल्का और लायलपुर, दोनों ही स्थानों के घंटाघरों का उद्घाटन एक ही दिन यानी 6 जून 1939 को किया गया था। आज यह ऐतिहासिक धरोहर पंजाब विधानसभा की आर्ट गैलरी की शान बढ़ाने के साथ-साथ पूरे देश का गौरव है। डीसी ने दिया बंद पड़ी घड़ी को ठीक करवाने का भरोसा स्थापना दिवस समारोह के दौरान स्थानीय निवासियों ने डिप्टी कमिश्नर के समक्ष घंटाघर की घड़ी को लेकर एक समस्या उठाई। लोगों ने शिकायत की कि घड़ी तकनीकी खराबी के कारण कभी चलती है तो कभी रुक जाती है। डीसी अमरप्रीत कौर संधू ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए जल्द ही घड़ी की मरम्मत करवाने और इसके स्थायी समाधान का आश्वासन दिया। विरासती पहचान को सहेजने के लिए जन-सहयोग की अपील डिप्टी कमिश्नर ने घंटाघर को फाजिल्का की आत्मा और सबसे बड़ी शान बताते हुए कहा कि प्रशासन इसकी सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व को बनाए रखने के लिए कदम उठाता रहा है और भविष्य में भी यह प्रयास जारी रहेंगे। उन्होंने लोगों की सराहना करते हुए कहा कि निवासियों ने इस विरासती इमारत को हमेशा संभाल कर रखा है। उन्होंने आगे भी इसी तरह के जन-सहयोग की अपील की ताकि इस ऐतिहासिक विरासत की उचित देखभाल की जा सके।
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