जालंधर में कांग्रेस छोड़ सुखविंदर कौर AAP में: नूरमहल नगर कौंसिल की प्रधानगी को परिवार सहित बदला पाला, कई और के आने का दावा – Nakodar News
नूरमहल नगर कौंसिल चुनाव के नतीजे आए अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता है कि स्थानीय राजनीति में बड़ा खेल हो गया। चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस पार्टी को उस समय करारा झटका लगा, जब वार्ड नंबर 3 से नवनिर्वाचित पार्षद और कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री सुखविंदर कौर अपने पूरे परिवार सहित आम आदमी पार्टी (AAP) में शामिल हो गईं। हल्का विधायक बीबी इंद्रजीत कौर मान ने उन्हें औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल करवाया और उनका स्वागत किया। सुखविंदर कौर नगर कौंसिल की पूर्व उप-प्रधान भी रह चुकी हैं, जिसके चलते उनका पाला बदलना कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ा सियासी नुकसान माना जा रहा है। आप का दावा-कांग्रेस के कई पार्षद आ सकते हैं साथ राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि सुखविंदर कौर का जाना तो सिर्फ एक शुरुआत है। आने वाले दिनों में कांग्रेस के कुछ और पार्षद भी आम आदमी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। जानकारों का मानना है कि अगले एक हफ्ते के भीतर नूरमहल नगर कौंसिल के गठन की पूरी तस्वीर साफ हो जाएगी, और ‘आप’ अपने बलबूते पर यहां कौंसिल बनाने की स्थिति में आ सकती है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस अपने बचे हुए पार्षदों के कुनबे को एकजुट रखने के लिए क्या कदम उठाती है और पार्टी छोड़ चुके नेताओं पर क्या कार्रवाई अमल में लाती है। फिलहाल, नूरमहल नगर कौंसिल की चाबी पूरी तरह से आम आदमी पार्टी के पाले में जाती हुई दिखाई दे रही है। हालांकि कांग्रेस के युवा सिटी प्रधान संदीप कुमार अरोड़ा ने बीते दिनों कहा था कि पार्टी और जनता के जनादेश को धोखा देने वाले नेताओं के खिलाफ बेहद सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। पहले भी हो चुका है कांग्रेस का खेल यह घटनाक्रम नूरमहल में कांग्रेस के पिछले 15 वर्षों के उस इतिहास की याद दिलाता है, जहां बहुमत के करीब पहुंचने के बावजूद पार्टी अक्सर अपने जनादेश को संभाल कर रखने में नाकाम रही है। इसबार भी ऐसा होने की संभावना लग रही है। इसका संकेत भी मिल रहा है। पहले कब बहुमत के बाद कुर्सी से चूकी कांग्रेस टिकट वितरण में भी कमजोर साबित हुई थी कांग्रेस स्थानीय राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि कांग्रेस की कमजोरी चुनाव की शुरुआत से ही दिखने लगी थी, जब पार्टी सभी 13 वार्डों में मजबूत और जिताऊ उम्मीदवार उतारने में भी पूरी तरह विफल रही थी। नतीजा यह हुआ कि जीतने के बाद भी पार्षद पार्टी के साथ टिके रहने को तैयार नहीं दिख रहे हैं।
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