पठानकोट का माधोपुर-हेडवर्क्स हाईटेक, पिछले साल हुई थी तबाही: हालात से निपटने को सिंचाई विभाग मुस्तैद; इस बार इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम संभालेगा कमान – Pathankot News
पठानकोट स्थित माधोपुर हेडवर्क्स इस मानसून सीजन के लिए पूरी तरह तैयार है। पिछले वर्ष बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुए 4 फ्लड गेटों के स्थान पर नए गेट स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही, हेडवर्क्स के कुल 54 गेटों की मरम्मत पूरी कर ली गई है, जो अब किसी भी संभावित बाढ़ की स्थिति से निपटने में सक्षम हैं। 27 अगस्त को माधोपुर बैराज के गेट टूटने और उसके बाद पैदा हुई बाढ़ की खौफनाक स्थिति से सबक लेते हुए इस बार सिंचाई विभाग ने मानसून के सीजन से पहले अभूतपूर्व तैयारियां की हैं। भारी सुरक्षा के बीच हेडवर्क्स के आधुनिकीकरण का काम पूरा हो चुका है। विभाग का दावा है कि इस बार तकनीक और बुनियादी ढांचे को इस कदर मजबूत किया गया है कि पिछले साल जैसी अनहोनी की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। 27 अगस्त को गेट टूटने से मची थी खलबली
गौरतलब है कि पिछले साल 27 अगस्त को ऊपरी पहाड़ी इलाकों में हुई भारी मूसलाधार बारिश के बाद रावी पूरे उफान पर था। जिसके चलते माधोपुर बैराज के गेट पानी के अप्रत्याशित और प्रचंड दबाव को झेल नहीं पाए थे और क्षतिग्रस्त होकर टूट गए थे। गेट टूटने के कारण अनियंत्रित पानी ने निचले इलाकों में भारी तबाही मचाई थी और बाढ़ का गंभीर संकट पैदा हो गया था। उस समय मैन्युअल रूप से गेटों को बंद करने और स्थिति को नियंत्रित करने में प्रशासन और विभाग के पसीने छूट गए थे। अब की मुस्तैदी: मैनुअल से पूरी तरह ‘ऑटोमैटिक’ हुआ बैराज
सिंचाई विभाग के एसडीओ अजीत कुमार ने बताया कि पिछले साल की आपदा से सीख लेते हुए इस बार बैराज के संचालन में ऐतिहासिक बदलाव किया गया है:
इलेक्ट्रॉनिक मोटराइजेशन: जो बैराज गेट पहले पूरी तरह मैनुअल (हाथ से) चलते थे, उन्हें अब पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक और मोटराइज्ड कर दिया गया है।
नए कंट्रोल पैनल व वायरिंग: बैराज की पुरानी वायरिंग को पूरी तरह बदलकर नई केबलिंग की गई है और इसके संचालन के लिए अत्याधुनिक कंट्रोल पैनल लगाए गए हैं।
सफल टेस्टिंग: विभाग द्वारा सभी गेटों की दो से तीन बार फाइनल टेस्टिंग की जा चुकी है, जिससे अब आपातकालीन स्थिति में पलक झपकते ही गेटों को खोला या बंद किया जा सकेगा।
क्षतिग्रस्त ढांचे पूरी तरह दुरुस्त: 27 अगस्त की आपदा में जो गेट और एडवांस व ओल्ड स्ट्रक्चर गंभीर रूप से डैमेज हुए थे, उन्हें नए सिरे से पूरी तरह रिपेयर और पहले से कहीं अधिक मजबूत कर दिया गया है।
सुरक्षा कवच: अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम में 40 फीट तक वायर क्रेट
बाढ़ के दौरान पानी के तेज बहाव और पत्थरों की मार से बैराज के फाउंडेशन को बचाने के लिए इस बार बड़े स्तर पर सुरक्षा दीवारें (वायर क्रेट) तैयार की गई हैं। यह काम किसी छोटे हिस्से में नहीं, बल्कि पूरे ऑल ओवर बैराज पर किया गया है।
अपस्ट्रीम में: बैराज के ऊपरी हिस्से की सुरक्षा के लिए 24 फीट के मजबूत वायर क्रेट बनाए गए हैं।
डाउनस्ट्रीम में: निचले हिस्से में पानी के कटान को रोकने के लिए 40 फीट के विशाल वायर क्रेट्स का निर्माण मुकम्मल किया जा चुका है।
मरम्मत कार्यों पर लगभग 35 करोड़ खर्च
इन पुनर्निर्माण और अन्य मरम्मत कार्यों पर लगभग 35 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। यह परियोजना हरियाणा की दयानंद कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा पूरी की गई है। नए फ्लड गेट लगाने के अलावा, हेडवर्क्स परिसर में डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में नदी के लगभग 100 मीटर लंबे और 50 मीटर चौड़े हिस्से को कंक्रीट से मजबूत किया गया है। भविष्य में तेज जल प्रवाह से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए सुरक्षा हेतु पत्थरों के क्रेट भी लगाए गए हैं। शाहपुरकंडी से आ रहा है 13 हजार क्यूसेक पानी
एसडीओ अजीत कुमार ने पानी की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि रंजीत सागर डैम से बिजली उत्पादन के बाद पानी शाहपुर कंडी डैम में स्टोर हो रहा है, जहां से इरीगेशन के लिए निरंतर 13 हजार क्यूसेक पानी रेगुलेट होकर आ रहा है। इस पानी का वितरण पूरी तरह सुचारू है, जिसमें से 400 क्यूसेक पानी कश्मीरी कैनाल को, 3,200 क्यूसेक पानी पंजाब के रास्ते राजस्थान को और शेष सारा पानी पंजाब की अपनी फसलों और नहरों के लिए जा रहा है। बेहद ऐतिहासिक है माधोपुर हेडवर्क्स
पंजाब के माधोपुर में रावी नदी पर स्थित ‘माधोपुर हेडवर्क्स’ एक ऐतिहासिक बैराज है, जिसका निर्माण 19वीं सदी में (1872-75 के दौरान) किया गया था। यह जल संरचना अपरबारी दोआब नहर (UBDC) का प्रमुख उद्गम स्थल है, जो पंजाब के गुरदासपुर, अमृतसर और तरनतारन जैसे जिलों में कृषि भूमि को सिंचित करती है।
माधोपुर हेडवर्क्स के इतिहास और विकास की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
प्रारंभिक निर्माण: इस बैराज का निर्माण पहली बार 1872-75 के आसपास रावी नदी के जल को ऊपरी बारी दोआब नहर में मोड़ने के लिए किया गया था, ताकि इस क्षेत्र में कृषि को बढ़ावा दिया जा सके।
आधुनिकरण (1959): बदलते समय के साथ पानी की बढ़ती माँगों को पूरा करने के लिए 1959 में इसका पुनरुद्धार और विस्तार किया गया।
भारत-विभाजन में भूमिका: 1947 में भारत के विभाजन के समय, इस ऐतिहासिक हेडवर्क्स को भारत को सौंप दिया गया था, जिससे पूर्वी पंजाब में सिंचाई प्रणाली को सुचारू रूप से चलाने में बड़ी मदद मिली।
क्षमता: मूल रूप से इसमें 54 बाढ़ द्वार बनाए गए थे, जिनकी पानी को मोड़ने की क्षमता लगभग 9,000 क्यूसेक तक आंकी गई थी।
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