13 साल पुराने ग्रिड केस में पूर्व CMD हाईकोर्ट पहुंचे: विजिलेंस FIR को बताया गलत, 8 जुलाई तक टली सुनवाई, रिश्वत-वित्तीय नुकसान का आरोप नहीं – Chandigarh News

13 साल पुराने ग्रिड केस में पूर्व CMD हाईकोर्ट पहुंचे:  विजिलेंस FIR को बताया गलत, 8 जुलाई तक टली सुनवाई, रिश्वत-वित्तीय नुकसान का आरोप नहीं – Chandigarh News




पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक केडी चौधरी ने अपने खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के मामले को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी है। सेवानिवृत्त अधिकारी ने अदालत से विजिलेंस ब्यूरो द्वारा दर्ज एफआईआर रद्द करने और मामले में आगे की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है। हालांकि हाईकोर्ट से उन्हें फिलहाल कोई अंतरिम राहत नहीं मिली है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 8 जुलाई के लिए निर्धारित कर दी है। 2013 में ग्रिड सब-स्टेशन मंजूरी से जुड़ा है मामला विजिलेंस ब्यूरो की एफआईआर वर्ष 2013 में लुधियाना के बसंत एवेन्यू इलाके में 66 केवी ग्रिड सब-स्टेशन स्थापित करने की प्रशासनिक मंजूरी से संबंधित है। जांच एजेंसी का आरोप है कि ग्रिड निर्माण के दौरान विभागीय मानकों और दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया। एफआईआर के अनुसार ग्रिड के लिए निर्धारित न्यूनतम एक एकड़ भूमि उपलब्ध नहीं थी और दो ग्रिड सब-स्टेशनों के बीच पांच किलोमीटर की अनिवार्य दूरी का भी पालन नहीं किया गया। इसी आधार पर पूर्व अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। बढ़ते बिजली लोड के कारण लिया गया था फैसला याचिका में केडी चौधरी ने कहा है कि बसंत एवेन्यू, दुगरी और आसपास के क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे बिजली लोड और ओवरलोड ट्रांसफार्मरों के कारण नए ग्रिड सब-स्टेशन की आवश्यकता महसूस की गई थी। क्षेत्रीय इंजीनियरों और फील्ड अधिकारियों ने वर्ष 2008 से ही इसके लिए प्रस्ताव भेजना शुरू कर दिया था। उन्होंने अदालत को बताया कि यह प्रस्ताव कई तकनीकी और प्रशासनिक स्तरों पर जांच के बाद अंतिम मंजूरी के लिए उनके पास पहुंचा था। चौधरी का कहना है कि जिन नियमों के उल्लंघन की बात की जा रही है, वे कोई वैधानिक प्रावधान नहीं बल्कि पुराने विभागीय दिशा-निर्देश थे। ऐसे कई प्रोजेक्ट हुए मंजूर पूर्व सीएमडी ने अपनी याचिका में कहा है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और भूमि की कमी को देखते हुए कई मामलों में ऐसे मानकों में छूट दी जाती रही है। उन्होंने दावा किया कि उनके सेवानिवृत्त होने के बाद भी कम भूमि और कम दूरी वाले कई ग्रिड सब-स्टेशनों को मंजूरी दी गई। रिश्वत-वित्तीय नुकसान का आरोप नहीं चौधरी ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि एफआईआर में कहीं यह आरोप नहीं है कि उन्होंने रिश्वत ली, व्यक्तिगत लाभ उठाया या सरकारी खजाने को किसी प्रकार का वित्तीय नुकसान पहुंचाया। उनका तर्क है कि एक प्रशासनिक और तकनीकी निर्णय को आपराधिक मामले का रूप दे दिया गया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि जिस शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई, उसकी जांच वर्ष 2018 और 2021 में हो चुकी थी और दोनों बार मामला बंद कर दिया गया था। इसके बावजूद करीब 13 वर्ष बाद एफआईआर दर्ज करना उचित नहीं है।



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