कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडलिस्ट अंकुश बोले-ट्रेनिंग में साथी ‘बौना’ कहते थे: पहला गेम हारने पर पापा ने संभाला; हिसार आने पर पूरे गांव को दावत दी – Hisar News
कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद अंकुश हिसार पहुंचे।
हिसार के अंकुश पंघाल ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स- 2026 में गोल्ड मेडल जीता। गुरुवार को पैतृक गांव भेरिया पहुंचने पर नोटों की माला पहनाकर उनका स्वागत किया गया। हिसार से 25 किलोमीटर दूर उनके गांव तक बहन नीलम ने खुली जीप चलाई।
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इसी जीप में अंकुश सवार थे। पूरे रास्ते जगह-जगह स्वागत हुए। ढोल- नगाड़ों पर ग्रामीणों ने डांस किया, आतिशबाजियां की गई। दैनिक भास्कर से बातचीत में 20 वर्षीय अंकुश पंघाल ने कहा- 11 साल की उम्र में पहली बार बॉक्सिंग ग्लव्स पहने थे।
उस समय साथ में ट्रेनिंग लेने वाले दोस्त ही छोटी हाइट होने पर ‘बौना’ कहकर चिढ़ाते थे। धीरे- धीरे संघर्ष किया, मेडल बढ़ने शुरू हुए तो साथियों ने चिढ़ाना बंद कर दिया। पहली स्टेट बॉक्सिंग चैंपियनशिप हारने पर पापा ने संभाला था।
उधर, अंकुश के गांव में पहुंचने पर पिता ने शाम को पूरे गांव को दावत दी। दावत में विशेष रूप से 5 तरह की डिश तैयार की गई थी।
हिसार पहुंचने पर परिजनों ने अंकुश पंघाल और उनके कोच प्रदीप का पगड़ी पहनाकर स्वागत किया।
पहले राउंड में पिछड़े, दूसरे-तीसरे में वापसी कर जीता गोल्ड
कॉमनवेल्थ में अंकुश पंघाल ने 80 किलो वेट कैटेगरी में इंग्लैंड के डिमेजी शिट्टू को 4-1 से हराकर गोल्ड मेडल जीता। मैच के पहले राउंड में पिछड़ने के बाद अंकुश ने कमबैक करते हुए शानदार शुरूआत की। दूसरे और तीसरे राउंड में कई शानदार पंच लगाकर अपना पहला कॉमनवेल्थ मेडल जीता।
इससे पहले सेमीफाइनल में उन्होंने कनाडा के जोशुआ ओफोरी को 5-0 से हराकर फाइनल में जगह बनाई थी। अंकुश ने वर्ष 2017 में महज 11 साल की उम्र में बॉक्सिंग शुरू की थी। उनके पिता सुरेश उन्हें गांव से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित कोचिंग सेंटर में रोज प्रैक्टिस के लिए लेकर जाते थे।

यह तस्वीर उस वक्त की है, जब अंकुश ने गोल्ड जीता था और गांव भेरिया में उसकी मां, बहन, भाई और अन्य परिजनों ने खुशी मनाई थी।
गोल्ड मेडलिस्ट अंकुश पंघाल ने इस तरह दिए सवालों के जवाब…
सवाल: कॉमनवेल्थ फाइनल जीतने के बारे में सोचा था? जवाब: यहां से रवाना होने से पहले ही गोल्ड के बारे में जरूर सोचा था। इस पूरे टूर्नामेंट में मेरा पूरा फोकस अपने पंच और कोच के इंस्ट्रक्शन पर रहा। जब सेमीफाइनल जीतकर फाइनल में पहुंचा तो सोचा अब देश के लिए गोल्ड जीतना ही है। अब देश के लिए गोल्ड मेडल जीतकर गर्व और खुशी महसूस हो रही है। आगे भी यही लक्ष्य है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश के लिए ऐसे ही मेडल लाता रहूं।
सवाल: बॉक्सिंग की शुरुआत कब हुई? जवाब: मैंने बॉक्सिंग की शुरुआत 2017 में की। उस समय 11 साल की उम्र थी। पहले दिन बॉक्सिंग के ग्लव्स पहनने भी नहीं आथे थे। सीनियर्स ने ग्लव्स पहनाए। इसके बाद रिंग में उतरा तो थोड़ी घबराहट भी हुई, मगर कोच ने कहा- कर लेगा। इसके बाद ट्रेनिंग शुरू हुई।
सवाल: इस जीत का श्रेय किसे देना चाहोगे? जवाब: बचपन में पापा (सुरेश) बॉक्सिंग की प्रैक्टिस कराने के लिए 15 किलोमीटर दूर ले जाते थे। मेरे साथ ही पापा वापस आते थे। उस समय कई लोग कहते थे, बच्चा अभी छोटा है, इतनी कम उम्र में प्रैक्टिस क्यों करवा रहे हो? पापा ने उसे नजरअंदाज कर लगातार प्रैक्टिस कराई।
सवाल: स्पोर्ट्स के दौरान कोई संघर्ष हुआ? जवाब: मैंने 2018 में अपनी पहली स्टेट बॉक्सिंग चैंपियनशिप खेली थी। मैं इसके फाइनल में हार गया था। इसके गेम के बाद मुझे इतनी निराशा हुई कि गेम छोड़ने के बारे में सोचने लगा था। इसके बाद पापा और कोच प्रदीप ने मुझे संभाला। इसके बाद दोबारा बॉक्सिंग रिंग में उतरकर मेहनत शुरू की।
सवाल: कॉमनवेल्थ के बाद अगला लक्ष्य क्या है? जवाब: मेरा अगला टारगेट अगले महीने होने वाले एशियन गेम्स हैं। अब थोड़ा रेस्ट करने के बाद एशियन गेम्स की ट्रेनिंग शुरू करूंगा। वहां भी देश के लिए गोल्ड मेडल जीतना अभी फोकस में रखा है। इसके लिए कोच से ट्रेनिंग को लेकर भी बात हुई है। अगले साल वर्ल्ड चैंपियनशिप होगी। उसमें जीतने के बाद ओलिंपिक टिकट मिल जाएगा। एशियन चैंपियनशिप के बाद मेरा पूरा फोकस इसी पर होगा।
सवाल: स्पोर्स्ट में कैसे आए, छोटी हाइट को कैसे टैकल किया? जवाब: जी हां, मेरी बहन नीलम भी खेलों से जुड़ी हुई हैं। वे बॉक्सिंग और शूटिंग की प्रैक्टिस करती हैं। नीलम को देखकर ही मैंने बॉक्सिंग में करिअर बनाने की ठानी। शुरुआत में मेरी हाइट कम थी। इस दौरान कुछ साथी भी मजाक बनाते थे। मगर, धीरे-धीरे हाइट बढ़ी तो कॉन्फिडेंस भी बूस्ट हुआ।
सवाल: हरियाणा की स्पोर्ट्स पॉलिसी को लेकर क्या कहेंगे? जवाब: हरियाणा सरकार खेलों और खिलाड़ियों के लिए अच्छा काम कर रही है। मेडल के बाद कैश प्राइज और सरकारी नौकरी भी मिल जाती है। लोकल स्टेडियम में कुछ सुधिवाएं और बढ़ानी चाहिए, इससे नई जनरेशन प्रेरित होकर खेलों की तरफ बढ़ेंगी।

अंकुश के कोच प्रदीप सावंत।
कोच बोले- पहले दिन ही अंकुश का गेम अच्छा लगा
अंकुश के कोच प्रदीप सावंत ने बताया कि मुझे पहले दिन ही अंकुश का गेम अच्छा लगा था। शुरुआत से ही अंकुश स्पोर्स्ट को लेकर काफी सीरियस है। कॉमनवेल्थ में फाइनल से पहले हमने प्लान किया था कि इंग्लैंड और कनाडा के बॉक्सर पर फोकस करना है।
इससे पहले अंकुश वर्ल्ड बॉक्सिंग कप में इंग्लैंड के मुक्केबाज से हार गए थे। इसके बाद हमने पूरी तैयारी की। फाइनल से पहले भी कई घंटे अंकुश से बात की। उसने पूरा गेम प्लान के अनुसार खेला। इसी का परिणाम है कि देश को एक और गोल्ड मेडल मिला।

अंकुश के गोल्ड मेडल जीतने के खुशी में पिता सुरेश ने पूरे गांव को दावत दी।
पिता ने पूरे गांव को दावत दी
कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने की खुशी में अंकुश के पिता सुरेश ने गुरुवार शाम को पूरे गांव को दावत दी। आंगन में एक बड़ा पंडाल लगाया गया। दावत में विशेष रूप से 5 तरह की डिश तैयार की गई, जिसमें देसी घी के लड्डू, स्पेशल बर्फी, रसगुल्ले, जलेबी शामिल रही।

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