साढ़े 7 वर्ष तक फौज में रहकर राष्ट्र की सेवा करने वाले एक जवान को बीमारी के पश्चात जिंदगी की दूसरी लड़ाई लड़नी पड़ी। फौज से मेडिकल आधार पर बाहर किए जाने के पश्चात उन्हें बताया गया था कि वे अब सेवा के योग्य नहीं हैं।

साथ ही उन्हें पेंशन मिलने की बात भी कही गई थी, मगर बाद में पेंशन देने से इनकार कर दिया गया। इसके पश्चात शुरू हुआ उनका संघर्ष 37 साल तक चला।

इसी बीच कभी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे तो कभी अधिकारियों के दरवाजे खटखटाए, किंतु हर बार निराशा हाथ लगी। परिवार की जिम्मेदारी उठाने हेतु थोड़ी-सी जमीन पर खेती की, मगर आर्थिक तंगी के चलते पत्नी और बेटे का पालन-पोषण करना भी मुश्किल हो गया। लेकिन हिम्मत न हारकर जंग जारी रखी।

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आखिरकार पंचकूला जिले के रायपुर रानी के रहने वाले 63 वर्ष की उम्र में नरमेल सिंह को न्याय मिला है। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT), चंडीमंदिर ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए दोबारा मेडिकल बोर्ड से आकलन कराने का आदेश दिया है। पेंशन की राशि कितनी होगी, यह उसकी रिपोर्ट पर तय होगी। हालांकि उन्हें लगभग 16 हजार रुपए प्रतिमाह दिव्यांगता पेंशन मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।

फौज में भर्ती हुए तो पूरी तरह फिट थे

नरमेल सिंह 10 दिसंबर 1981 को फौज की 105 आर्टिलरी एयर डिफेंस रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। भर्ती के वक्त वे पूरी तरह स्वस्थ थे। उन्होंने लगभग साढ़े 7 साल तक फील्ड और शांत क्षेत्रों में सेवाएं दीं। सब कुछ सामान्य चल रहा था, किंतु फौज में रहते हुए उनकी तबीयत बिगड़ने लगी।

12 जुलाई 1986 को उन्हें सिजोफ्रेनिया बीमारी होने का पता चला। इसके पश्चात मेडिकल बोर्ड ने 18 अप्रैल 1989 को 40 प्रतिशत दिव्यांगता के साथ उन्हें मेडिकल आधार पर सेना से सेवा मुक्त कर दिया। उस वक्त उन्हें बताया गया था कि वे फौज में सेवा जारी रखने के योग्य नहीं हैं और उन्हें पेंशन मिलेगी।

घर लौटे तो पेंशन नहीं मिली, खेती से चलाया परिवार

फौज से घर लौटने के पश्चात उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं। उन्हें पेंशन नहीं मिली, जबकि शादी नहीं हुई थी। माता पिता का पहले ही देहांत हो चुका था। भाई का परिवार था, परंतु हर समय मेरा ख्याल कौन रखेगा। यह भी समस्या थी। मेरी दवाई शुरू हो चुकी थी। देसी उपचार भी चल रहा था। ऐसे में घरवालों को पूरा विश्वास था कि मैं ठीक हो जाऊंगा।

1992 में शादी कर दी गई। 1993 में बेटे गुरजिंदर का जन्म हुआ। अब परिवार की जिम्मेदारी बढ़ती जा रही थी। घर में थोड़ी-सी जमीन थी। इसी पर खेती करके परिवार का खर्च चलाने लगे। बेटा बड़ा होता जा रहा था। सीमित जमीन और आमदनी में पत्नी और बेटे का पालन-पोषण करना मुश्किल होता गया। इसके बावजूद उन्होंने दिव्यांगता पेंशन पाने की उम्मीद नहीं छोड़ी।

जिला जवान बोर्ड से भी नहीं मिली सहायता

नरमेल सिंह ने पेंशन हेतु कई बार प्रयास किए। क्योंकि जब उन्हें फौज ने घर भेजा तो उनके पास सारे कागज नहीं थे। जिससे वह काफी पेरशान हो गए थे। किंतु वह कागज जुटाने में लगे रहे। पंचकूला जिला सैनिक बोर्ड के माध्यम से फौज के रिकॉर्ड कार्यालय में भी अपना मामला उठाया, परंतु उन्हें राहत नहीं मिली।

बाद में संबंधित विभाग यानी कंट्रोलर ऑफ डिफेंस अकाउंट्स (CDA) ने उनका दावा खारिज कर दिया। तर्क था कि सिजोफ्रेनिया संवैधानिक प्रकृति की बीमारी है और इसके लिए सेना जिम्मेदार नहीं है। इसके बाद वे हर जगह से निराश हो गए और उन्हें लगने लगा कि शायद अब पेंशन नहीं मिल पाएगी।

अखबार में खबर पढ़कर फिर जगी उम्मीद

साल 2020 में एक सुबह नरमेल सिंह अखबार पढ़ रहे थे। इसमें उनकी तरह ही बीमारी की वजह से फौज से बाहर हुए एक पूर्व जवान को पेंशन मिलने की खबर प्रकाशित हुई थी। खबर पढ़कर उन्हें लगा कि जब दूसरे पूर्व जवान को न्याय मिल सकता है तो उन्हें भी पेंशन मिल सकती है।

खबर में जिस व्यक्ति के मामले में सहायता करने वाली NGO का जिक्र था, उन्होंने उससे संपर्क किया। इसके पश्चात एक्स सर्विसमैन ग्रीवेंस सेल (रजिस्टर्ड), मोहाली ने उनका प्रकरण अपने हाथ में लिया।

AFT में दी दलील, फौज में रहते हुए हुई थी बीमारी

NGO ने 22 अक्टूबर 2020 को AO 86/2020 के तहत उनका प्रकरण सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT), चंडीमंदिर में दायर किया। मामला कानूनी रूप से जटिल था। सुनवाई के बीच NGO के वकील आरएन ओझा ने दलील दी कि नरमेल सिंह साल 1981 में पूरी प्रकार स्वस्थ अवस्था में फौज में भर्ती हुए थे।

उन्हें बीमारी फौज में सेवा के बीच हुई। वे यह बीमारी अपने साथ घर से लेकर नहीं आए थे। इसलिए केवल बीमारी को संवैधानिक प्रकृति का बताकर दिव्यांगता पेंशन से इनकार नहीं किया जा सकता। NGO के अनुसार, लंबी सुनवाई और कानूनी दलीलों के बाद न्यायाधिकरण ने 22 अक्टूबर 2026 को नरमेल सिंह के पक्ष में निर्णय सुनाया।

अब मेडिकल बोर्ड करेगा दिव्यांगता का आकलन

NGO के अध्यक्ष रिटायर्ड कर्नल सोही के मुताबिक, अब नरमेल सिंह को दोबारा मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होना होगा। बोर्ड उनकी दिव्यांगता का आकलन करेगा। NGO का कहना है कि उन्हें 50 प्रतिशत दिव्यांगता के आधार पर पेंशन मिलने की संभावना है।

इसके तहत लगभग 16 हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन मिल सकती है। इसके अलावा उन्हें मुफ्त चिकित्सा सुविधा और अन्य लाभ भी मिलेंगे। NGO के अनुसार, पेंशन का फायदा शुरुआती वक्त से या कम से कम पिछले 9 वर्षों की अवधि हेतु मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इसकी अंतिम अवधि और राशि मेडिकल बोर्ड एवं संबंधित विभाग की प्रक्रिया के पश्चात तय होगी।

इस प्रकार तय हुई गणना

कर्नल सोही बताते है कि हम 9 वर्ष का जिक्र इस वजह से कर रहे है कि क्योंकि सुप्रीम अदालत की एक रूलिंग है। जिसके अनुसार ऐसे में जब फैसले के आदेश आते है। उससे तीन साल पुराने फायदा मिलेंगे। पेंशन कितनी मिलेगी।

इसके लिए आर्मी का मेडिकल बोर्ड पड़ताल करेगा। जो अपने हिसाब से दिव्यांगता तय करेगा। हालांकि जब सेना ने उन्हें घर भेजा था, उस वक्त चालीस फीसदी दिव्यांगता बताया था। नरमैल सिंह बताते है कि उनका बेटा एक निजी फर्म में नौकरी करता है।

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