दिवाली पर प्रायः बाजारों में चीनी के खिलौनों के रूप में गाय, हाथी और घोड़े बिकते हैं और लोग इन्हें खरीदते हैं। ये चीनी के खिलौने गुरु नगरी की वॉल सिटी (चारदीवारी) में स्थित पुराने थोक और पारंपरिक बाजारों में बनाए जाते हैं।

लेकिन इस बार चीनी महंगी होने से इन खिलौनों की मिठास कुछ फीकी हो गई है, क्योंकि जो खिलौने पहले 100 रुपए किलो मिलते थे, वे अब 30 रुपए महंगे होकर 130 रुपए प्रति किलो हो गए हैं। नगर के अंदरूनी इलाके मिश्री बाजार, आटा मंडी समेत अन्य बाजारों में कारीगर खिलौनों को बनाने में दिन-रात लगे हैं।

स्थानीय हलवाई और पारंपरिक कारीगर इन्हें बनाने हेतु अपनी अस्थायी भट्ठियों पर लकड़ी के विशेष सांचों का इस्तेमाल करते हैं। ये चीनी के खिलौने और खील गुरु नगरी समेत पंजाब के अन्य जिलों जैसे जालंधर, लुधियाना और हरियाणा के क्षेत्रों में भी थोक बाजारों में पहुंचते हैं। दीवाली के दिन लोग इन चीनी के खिलौनों की पूजा करके परिवार में सुख-शांति की कामना करते हैं।

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चाशनी बनाना : चीनी और पानी को एक निश्चित गाढ़ेपन तक उबाला जाता है। इसमें लाल, हरा और सफेद रंग भी मिलाया जाता है। उबलती हुई गाढ़ी चाशनी को लकड़ी के बने विशेष सांचों में डाला जाता है, जिन पर हाथी, गाय या घोड़े बने होते हैं। .तैयारी : कुछ ही मिनटों में चाशनी ठंडी होकर जम जाती है और सांचे से रंग-बिरंगे खिलौने बाहर आ जाते हैं।

इसके पश्चात खिलौनों को डिब्बों में पैक करके मार्केट में भेजा जाता है। दिवाली की शाम जब धन की देवी मां लक्ष्मी और भगवान गणेश का पूजन होता है, तो खील (धान) से बनी और चीनी के खिलौनों का भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है। क्योंकि दिवाली के दिन पशुओं गाय, हाथी, घोड़े के रूप में इनकी पूजा का विशेष महत्त्व है।

गाय : हिंदू धर्म में गाय को लक्ष्मी का स्वरूप और ‘कामधेनु’ माना गया है, जो घर में सुख-समृद्धि लाती है। .हाथी: हाथी (गजलक्ष्मी) वैभव, शक्ति और ऐश्वर्य का प्रतीक है। .घोड़ा: यह कामयाबी और निरंतर प्रगति का प्रतीक है। खिलौने बनाने वाले कारीगर अमरेश, गोपाल, प्रवीण और राम नरेश का कहना है कि वे पिछले कई सालों से ये खिलौने बना रहे हैं।

यह पुरातन परंपरा है। उस समय आधुनिक मिठाइयां और प्लास्टिक के खिलौने नहीं होते थे, तब ये बच्चों हेतु दीवाली का प्रमुख आकर्षण हुआ करते थे। बच्चे पूजा के पश्चात चीनी के इन खिलौनों हाथी, गाय, पक्षी को चाव से खाते थे।

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