आसरा वेल. फाउंडेशन ने लगाया खूनदान कैंप – Amritsar News
सतीश कपूर | अमृतसर छेहर्टा के गांव घनूपुर स्थित बाबा बेर शाह की मजार पर सालाना मेला मनाया गया। मेले में सुबह से लेकर रात तक हजारों की संख्या में श्रद्धालु माथा टेकने पहुंचे। कमेटी के प्रधान जगजीत सिंह, कोषाध्यक्ष दविंदर सिंह, गुरजंट सिंह और कुलविंदर सिंह काला ने बताया कि वे पिछले 15-20 साल से प्रबंधक कमेटी के रूप में यह सेवा निभा रहे हैं। इस स्थान पर उनके दादा-दादी और माता-पिता भी माथा टेकने आते रहे हैं। उन्होंने बताया कि बाबा जी यहां कब आए थे और उनका जन्म कब हुआ था, इसके बारे में किसी को कोई पता नहीं है; मगर फिर भी उनके प्रति आस्था-विश्वास के चलते यह मेला हर साल मनाया जाता है। सिर्फ इतना पता है कि यहां एक बेर के वृक्ष के नीचे बाबा आकर बैठ गए थे और उनके स्वर्गवास होने के बाद उनकी याद में लोगों ने मेला मनाना शुरू कर दिया। बाबा बेर शाह मेले में आसरा वेलफेयर फाउंडेशन की ओर से खूनदान कैंप लगाया। प्रधान विक्की बवरा की अध्यक्षता में लगाए कैंप में कई करीब 50 यूनिट खून लोगों ने दिया। सुबह से लेकर शाम तक चले खूनदान कैंप में मनजिंदर पाल मोनू, रछपाल भट्टी, जागीर सिंह, रघु खत्री, गगन खत्री, लाली पहलवान, कमल खत्री, गुरजंट सिंह, मनजोत सिंह समेत कई लोग खूनदान देने पहुंचे। इलाका वासी कैप्टन इंद्रजीत सिंह के मुताबिक भारत पाक विभाजन से पहले मेला लगता आ रहा है। बाबा बेरशाह, बाबा मरने शाह व बाबा जंड पीर 3 भाई थे। जिसके इतिहास के बारे तो किसी को पता नहीं होगा पर हर साल तीनों की मजार पर मेला मनाया जाता है। इलाका वासी हरिंदर सिंह मेले में झाड़ू पकड़ कर सेवा कर रहा था। उन्होंने कहा वह छोटे थे तब से माथा टेकने आते हैं। परंतु कभी इतिहास के बारे में न तो बताया, न किसी से पूछा है। बाबा पर आस्था रख माथा टेकने आ जाते हैं। कमेटी प्रधान के मुताबिक, वीरवार रात को मजार पर पारंपरिक रूप से मेहंदी की रस्म निभाई गई, जिसमें कमेटी और आस-पास की संगत ने बाबा बेर शाह को मेहंदी लगाई। फूलों से सजी तीनों मजार पर इलाके के हर धर्म के लोग माथा टेकते नजर आए। रात को मशहूर कव्वाल सन्नी सुल्ताना और अन्य कलाकारों ने सूफियाना कव्वालियों से बाबा जी का गुणगान किया, जिसे सुनने के लिए रातभर संगत जुटी रही। इस मेले में पार्षद छवि ढिल्लों ने भी शाम 7 बजे पहुंचकर माथा टेका। मेले के दौरान संगत के सहयोग से सारा दिन नूडल्स, टिक्की, कुल्फी, कॉफी, पकौड़े, गोलगप्पे और जूस आदि के अटूट लंगर चलते रहे।
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