सुप्रीम कोर्ट बोला- यात्रियों को सेकेंड क्लास कहना गलत: यह शब्द रेलवे कोच के लिए; ट्रेन हादसे के पीड़ित ​को 10 साल बाद ₹8 लाख मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट बोला- यात्रियों को सेकेंड क्लास कहना गलत:  यह शब्द रेलवे कोच के लिए; ट्रेन हादसे के पीड़ित ​को 10 साल बाद ₹8 लाख मुआवजा


नई दिल्ली/भोपाल12 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि किसी यात्री की श्रेणी उसके खर्च से तय नहीं होनी चाहिए। रेलवे के नियमों में इस्तेमाल होने वाले ‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर आपत्ति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि ‘सेकेंड क्लास’ का संबंध कोच से होना चाहिए, यात्री से नहीं।

कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल का फैसला पलटते हुए ट्रेन हादसे में जान गंवाने वाले एक व्यक्ति के परिवार को 8 लाख रुपए मुअवाजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि मृत यात्री के पास टिकट नहीं मिलने भर से उसके परिवार को मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर मुअवाजा राशि जारी करने के निर्देश दिए गए हैं। देरी होने पर दावा दायर करने की तारीख से 8% सालाना ब्याज भी देना होगा।

10 साल पहले ट्रेन से गिरकर हुई थी मौत

मामला नवंबर 2015 का है। मध्य प्रदेश के चंद्रकांत ठक्कर रायपुर से अहमदाबाद जा रहे थे। यात्रा के दौरान वे अहमदाबाद-हावड़ा मेल से गिर गए और उनकी मौत हो गई। हादसे के बाद उनका बैग भी गायब हो गया, जिसमें टिकट होने की बात कही गई थी।

टिकट बरामद नहीं होने पर रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने उन्हें बोना फाइड यात्री नहीं माना और मुआवजा देने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब दोनों फैसलों को पलट दिया और मृतक चंद्रकांत ठक्कर की पत्नी लता ठक्कर को मुआवजा देने का आदेश दिया।

वैध यात्री का दर्जा सिर्फ टिकट नहीं मिलने से खत्म नहीं होता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे दुर्घटना मुआवजा कानून एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी संकीर्ण नहीं, बल्कि उदार व्याख्या होनी चाहिए। सिर्फ टिकट बरामद नहीं होने से किसी व्यक्ति का वैध यात्री (बोना फाइड पैसेंजर) होना समाप्त नहीं हो जाता। दावेदार शपथपत्र और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अपना प्रारंभिक दावा साबित कर सकता है। इसके बाद दावे को गलत साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे की होगी।

रेलवे और यात्रियों, दोनों की जिम्मेदारी

कोर्ट ने कहा कि ट्रेन हादसों की पूरी जिम्मेदारी केवल रेलवे पर नहीं डाली जा सकती। यात्रियों को भी अपनी सुरक्षा के प्रति सतर्क रहना होगा। चलती ट्रेन पकड़ना, दरवाजे पर लटककर सफर करना और अनावश्यक जोखिम उठाना खतरनाक है। हालांकि कई बार यात्रियों के सामने व्यावहारिक मजबूरियां होती हैं, लेकिन सुरक्षित यात्रा के लिए सावधानी जरूरी है।

रेलवे से कहा- भीड़भाड़ रोकें, स्टाफ बढ़ाएं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भीड़भाड़ वाली ट्रेनों से गिरने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। रेलवे ने सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए नियम बनाए हैं, लेकिन उनका प्रभावी पालन जरूरी है। अदालत ने रेलवे में पर्याप्त स्टाफ बढ़ाने की भी सलाह दी, ताकि टिकट जांच, भीड़ नियंत्रण और आपात स्थिति में त्वरित सहायता जैसी व्यवस्थाएं बेहतर हो सकें। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *