पंजाब में ‘सतलुज’ फिल्म को लेकर क्रेज: प्रोजेक्टर की 15 अगस्त तक बुकिंग, ₹5000 देकर बुक कर रहे बड़ी स्क्रीन; सुखबीर का बड़ा ऐलान – Pathankot News

पंजाब में ‘सतलुज’ फिल्म को लेकर क्रेज:  प्रोजेक्टर की 15 अगस्त तक बुकिंग, ₹5000 देकर बुक कर रहे बड़ी स्क्रीन; सुखबीर का बड़ा ऐलान – Pathankot News




पंजाब में दिलजीत दोसांझ अभिनीत और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ (पहले नाम ‘पंजाब 95’) को लेकर एक अभूतपूर्व जन-आंदोलन और सियासी तूफान खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार के निर्देश पर फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से रिलीज के महज 48 घंटों के भीतर हटाए जाने के बाद, पंजाब के लोगों और राजनीतिक दलों ने सेंसरशिप के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल दिया है। ग्राउंड लेवल पर स्थिति यह है कि सरकारी पाबंदियों के बावजूद यह फिल्म पंजाब के गांव-गांव और घर-घर में पहुंच चुकी है। भारतीय किसान यूनियन और शिरोमणि अकाली दल के बड़े ऐलान ने साफ कहा है कि इतिहास को दबाने की कोशिशों को पंजाब स्वीकार करने के मूड में नहीं है। इसके लिए क्रेज इतना है कि किसान संगठन के प्रोजेक्टर 15 अगस्त तक बुक हो गए। लोग फिल्म की सॉफ्ट कॉपी मंगवा कर 5 हजार खर्च कर डीजे की एलईडी बुक कर रहे हैं। ताकि गांव या गुरुद्वारों में स्क्रीनिंग की जा सके। प्रोजेक्टर 15 अगस्त तक बुक, पेन ड्राइव और वॉट्सएप पर ‘सतलुज’ की बाढ़
भारतीय किसान यूनियन के पंजाब यूथ अध्यक्ष इंद्रपाल सिंह बैंस ने जमीन पर दिख रहे इस क्रेज की पुष्टि की है। उनके मुताबिक गांवों और कस्बों में फिल्म ‘सतलुज’ को सामूहिक रूप से देखने का लोगों में इस कदर जुनून है कि उनके पास उपलब्ध सभी प्रोजेक्टर 15 अगस्त तक के लिए पूरी तरह बुक हो चुके हैं। डीजे की LED स्क्रीन का सहारा: जिन लोगों को प्रोजेक्टर नहीं मिल पा रहे हैं, वे फिल्म देखने के लिए शादियों और कार्यक्रमों में इस्तेमाल होने वाली डीजे ऑपरेटरों की बड़ी एलई़डी स्क्रीन किराए पर बुक कर रहे हैं। 5 हजार रुपये तक खर्च करने को तैयार: बैंस ने बताया कि लोग अपने स्तर पर गांवों के खुले मैदानों या गुरुद्वारा साहिब के बाहर फिल्म की स्क्रीनिंग रखने के लिए 5,000 रुपये तक खर्च करने को सहर्ष तैयार हैं। डिजिटल शेयरिंग की कोई मनाही नहीं: फिल्म की डिजिटल कॉपियों की मांग इतनी बढ़ गई है कि लोग लगातार फोन करके व्हाट्सएप पर सॉफ्ट कॉपी मांग रहे हैं। बीकेयू की यूथ विंग लोगों को पेन ड्राइव और व्हाट्सएप के जरिए मुफ्त में फिल्म बांट रही है और किसी को भी मना नहीं किया जा रहा है। शिरोमणि अकाली दल हर गांव में दिखाएगा फिल्म
इस बीच, मामले ने पूरी तरह से राजनीतिक और सामाजिक रंग ले लिया है। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने केंद्र सरकार द्वारा फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने को “सामूहिक स्मृति, सत्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला” करार दिया है। सुखबीर बादल ने ऐलान करते हुए कहा कि अकाली दल हर गांव, हर कस्बे में खुद ‘सतलुज’ फिल्म की स्क्रीनिंग आयोजित करेगा। हमारी युवा पीढ़ी को यह जानने का पूरा हक है कि 1980 और 1990 के दशक में पंजाब ने कितना दर्द झेला है और भाई जसवंत सिंह खालड़ा ने सच्चाई को सामने लाने के लिए क्या सर्वोच्च बलिदान दिया था। इतिहास को सेंसरशिप के जरिए दफनाया नहीं जा सकता। इससे पहले दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और वारिस पंजाब दे जैसे संगठनों ने भी इस मुहिम को समर्थन देते हुए पंजाब और दिल्ली के ऐतिहासिक गुरुद्वारों और सार्वजनिक मैदानों में इसके खुले प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। क्यों भड़का है विवाद? क्या है फिल्म ‘सतलुज’ की कहानी?
यह विवाद और लोगों का यह क्रेज अकारण नहीं है। फिल्म की पृष्ठभूमि पंजाब के उस दौर से जुड़ी है जिसे वहां का ‘काला दौर’ कहा जाता है। जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक: यह फिल्म प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने 1984 से 1994 के बीच पंजाब में पुलिस द्वारा लावारिस बताकर अवैध रूप से अंतिम संस्कार किए गए हजारों अज्ञात शवों की सच्चाई उजागर की थी। 127 कट्स और लंबी कानूनी लड़ाई: फिल्म निर्माता हनी त्रेहान और दिलजीत दोसांझ पिछले 4 सालों से इसकी रिलीज के लिए सेंसर बोर्ड (CBFC) से लड़ रहे थे। बोर्ड ने फिल्म में 127 कट्स लगाने की मांग की थी, जिसे मेकर्स ने मानने से इन्कार कर दिया था। ओटीटी से अचानक हटाया जाना:आखिरकार फिल्म को बिना किसी कट के ‘सतलुज’ नाम से ZEE5 पर रिलीज किया गया, लेकिन महज दो दिन बाद ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आईटी एक्ट की धारा 69A के तहत इसे भारत में प्रतिबंधित कर प्लेटफॉर्म से हटवा दिया और मामला इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) को सौंप दिया।



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