पंजाब कांग्रेस में बदलाव में देरी क्यों?: जट्ट सिख-दलित वोट बैंक बिखरने का डर, 2022 की हार का प्रेशर; एक्सपर्ट से जानिए देरी की 4 वजहें – Ludhiana News
पंजाब विधानसभा चुनाव में अब करीब 8 महीने बाकी हैं। कुछ ही महीनों में आचार संहिता लागू हो जाएगी। फिर कैंडिडेट्स का सिलेक्शन, चुनावी रणनीति जैसे कई काम हैं, लेकिन लेकिन कांग्रेस अभी तक यह भी तय नहीं कर पाई कि चुनाव में पंजाब संगठन की कमान किसके हाथ होग
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पार्टी के टॉप सोर्सेज दावा कर रहे हैं कि पूरा खाका तैयार है। राहुल गांधी भी मंजूरी दे चुके, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ऐलान फिर भी नहीं कर पा रहा।
सवाल यह है कि आखिर ऐलान किस बात पर रुका है? क्या कांग्रेस को दलित-जट्टसिख वोट बैंक के बिखरने का डर है? 2022 की हार अब भी पीछा नहीं छोड़ रही? या फिर हाईकमान को अपने ही नेताओं की बगावत का डर सता रहा है? एक्सपर्ट के हवाले से जानिए, देरी के पीछे क्या बड़ी वजहें हैं:-
देरी के 4 बड़े कारण:-
1. दलित बनाम जट्टसिख वोट बैंक का संतुलन
पंजाब में अनुसूचित जाति (SC) की आबादी 31.94% है, जो देश में सबसे अधिक है। वहीं, जट्टसिखों की आबादी का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन विभिन्न राजनीतिक अध्ययनों में उनकी हिस्सेदारी करीब 18 से 22 प्रतिशत मानी जाती है। हालांकि, आबादी कम होने के बावजूद ग्रामीण पंजाब, खेती और राजनीति में जट्टसिख समुदाय का प्रभाव काफी मजबूत माना जाता है।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा के मुताबिक, कांग्रेस को डर है कि यदि चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो जट्टसिख मतदाताओं का एक वर्ग अकाली दल, आम आदमी पार्टी या भाजपा की ओर जा सकता है। दूसरी ओर यदि चन्नी को जिम्मेदारी नहीं दी गई तो राज्य की सबसे बड़ी दलित आबादी में गलत संदेश जा सकता है। खुद चन्नी भी कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि कांग्रेस के शीर्ष संगठनात्मक पदों पर जट्टसिख नेताओं का दबदबा है।

2. 2022 का असफल प्रयोग अभी भी याद
2022 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया था। पार्टी को उम्मीद थी कि दलित मुख्यमंत्री का फैसला चुनावी लाभ देगा, लेकिन नतीजे उलटे रहे। कांग्रेस 2017 की 77 सीटों से घटकर 2022 में सिर्फ 18 सीटों पर रह गई। पार्टी का वोट शेयर भी करीब 38.5% से घटकर लगभग 23% पर आ गया।
सबसे बड़ा झटका यह रहा कि चन्नी खुद भदौड़ और चमकौर साहिब, दोनों सीटों से चुनाव हार गए। पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा का कहना है कि पार्टी हाईकमान को डर है कि नेतृत्व परिवर्तन की रणनीति कहीं इस बार भी उल्टी न पड़ जाए।

3. गुटबाजी और बगावत का डर
सीनियर जर्नलिस्ट एवं पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि भाजपा पंजाब में संगठन विस्तार पर आक्रामक तरीके से काम कर रही है। कांग्रेस नहीं चाहती कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद किसी बड़े नेता या समर्थक गुट में नाराजगी पैदा हो। राजा वड़िंग, प्रताप सिंह बाजवा, सुखजिंदर रंधावा और चरणजीत सिंह चन्नी जैसे नेताओं के अलग-अलग समर्थक समूह हैं।
ऐसे में यदि किसी एक पक्ष को ज्यादा महत्व मिला तो असंतोष खुलकर सामने आ सकता है। ऐसी स्थिति में पार्टी के भीतर बगावत या नेताओं के पाला बदलने की आशंका बढ़ सकती है, जिसका राजनीतिक फायदा भाजपा उठा सकती है। हाईकमान इसी वजह से सभी नेताओं की भूमिका तय करने के बाद ही अंतिम घोषणा करना चाहता है।
4. पार्टी में एक राय नहीं, टाइमिंग पर सवाल
नेतृत्व परिवर्तन की टाइमिंग पर कांग्रेस के भीतर भी अलग-अलग राय है। चंडीगढ़ से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि चुनाव से ठीक पहले संगठन बदलना उचित समय नहीं है। उनका कहना है कि किसी भी प्रदेश अध्यक्ष को परिणाम देने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए।
वहीं, पटियाला से सांसद धर्मवीर गांधी ने भी सोशल मीडिया पर संकेत दिया था कि फैसला करना है तो जल्द किया जाए। हालांकि, बाद में उन्होंने अपनी पोस्ट हटा दी थी। इन बयानों से भी साफ है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की टाइमिंग पर पूरी सहमति नहीं है।


कांग्रेस के सोशल इंजीनियरिंग के इस फॉर्मूले की तैयारी:-
- चन्नी को सौंपी जाएगी संगठन की कमान: कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक हाईकमान सामाजिक संतुलन के फार्मूले पर काम कर रहा है। चरणजीत सिंह चन्नी को संगठन की कमान देने के साथ अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी अहम जिम्मेदारियां देने की तैयारी है।
- वड़िंग–रंधावा को चुनावी जिम्मा, सिंगला वर्किंग प्रधान: सूत्रों का दावा है कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा को चुनावी रणनीति और संगठन की महत्वपूर्ण समितियों में बड़ी भूमिका दी जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक विजय इंदर सिंगला को हिंदू चेहरे के तौर पर वर्किंग प्रधान बनाने पर भी विचार चल रहा है।
- बाजवा का पद बरकरार, प्रगट सिंह भी चर्चा में: वहीं कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए रखकर जट्ट सिख नेतृत्व को भी संतुलित करने की रणनीति पर विचार हो रहा है। हालांकि इस पद के लिए जालंधर कैंट से MLA प्रगट सिंह का नाम भी चर्चा में है।
- जट्टसिख-दलित वोट बैंक संतुलन चुनौती: हालांकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ नया प्रदेश अध्यक्ष चुनना नहीं, बल्कि पंजाब के सबसे बड़े दलित वोट बैंक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जट्ट सिख नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना है।
- 2022 की सीख, संगठन-नेतृत्व भी जरूरी: 2022 के चुनाव ने यह भी दिखाया कि सिर्फ सामाजिक समीकरण बदलने से जीत नहीं मिलती। संगठन, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की एकजुटता भी उतनी ही जरूरी होती है। 2022 के चुनाव में सरकार और संगठन के बीच तालमेल की कमी भी कांग्रेस की हार की एक बड़ी वजह मानी गई। प्रदेश अध्यक्ष रहते नवजोत सिंह सिद्धू और तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच मतभेदों की चर्चा पूरे चुनाव अभियान के दौरान होती रही, जिसका निगेटिव इंपैक्ट पड़ा।
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