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सबरीमाला केस में 5वें दिन की सुनवाई: याचिकाकर्ता बोला- आस्था और विश्वास समय के साथ बदलते हैं, इन्हें कानून से नहीं बदल सकते

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सबरीमाला केस में 5वें दिन की सुनवाई:  याचिकाकर्ता बोला- आस्था और विश्वास समय के साथ बदलते हैं, इन्हें कानून से नहीं बदल सकते


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नई दिल्ली9 घंटे पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री की इजाजत दी थी। इस फैसले के लिए याचिकाओं पर अब सुनवाई हो रही है।

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 5वें दिन की सुनवाई जारी है। याचिकाकर्ता की तरफ से एडवोकेट राजीव धवन ने कोर्ट से कहा कि आस्था या विश्वास समय के साथ हमेशा बदलते रहते हैं। यह बदलाव सिर्फ किसी कानून के बन जाने से नहीं आता; बल्कि यह बदलाव तो लोगों के बीच से ही उभरकर आता है।

इससे पहले 9 जजों की बेंच ने 15 अप्रैल की सुनवाई में कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।

वहीं मंदिर प्रशासन त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने कहा कि सबरीमाला कोई खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट का मामला नहीं है। यहां के देवता ब्रह्मचारी हैं। भारत में अयप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं। अगर महिलाओं को दर्शन करना है, तो वहां जाएं। उन्हें इसी खास मंदिर में क्यों आना है।

केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है।

7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई

सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

पिछले 4 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…

7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत

8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा

9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा

15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता

सबरीमाला केस से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट में पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे के ब्लॉग से गुजर जाएं…

अपडेट्स

11:14 AM17 अप्रैल 2026

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जस्टिस अमनुल्लाह बोले- आस्था में उसका प्रकटीकरण और उसे किस तरह से निभाया जाए-ये दोनों ही बातें शामिल

जस्टिस नागरत्ना: आप कह रहे हैं कि ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ की कसौटी पर इसे छुआ नहीं जा सकता। और अगर कोई विवाद होता है, तो अदालतें इस मामले को देखेंगी। आज सुबह यह दलील दी गई थी कि ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ को ही खत्म कर दिया जाए।

गिरि: नहीं, नहीं, मैं इसे पूरी तरह से खत्म नहीं करना चाहता।

जस्टिस अमनुल्लाह: आस्था में उसका प्रकटीकरण और उसे किस तरह से निभाया जाए-ये दोनों ही बातें शामिल होती हैं। मंदिर बनाना भी इसी प्रकटीकरण का एक हिस्सा है।

10:42 AM17 अप्रैल 2026

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एडवोकेट गिरी बोले- मूर्ति पूजा हिंदू आस्था का अहम हिस्सा है, तब मूर्ति देवता बन जाती है

एडवोकेट गिरी ने कहा यह पब्लिक धर्म या पब्लिक आस्था का सवाल नहीं है। हर मंदिर की अपनी अलग खासियत होती है क्योंकि हर देवता की अपनी खासियत होती है। जब मूर्ति पूजा हिंदू आस्था का एक अहम हिस्सा होती है, तो मूर्ति देवता बन जाती है, और देवता की अपनी खासियतें होती हैं। उन खासियतों को बनाए रखना पूजा का हिस्सा है। जब मैं मूर्ति पूजा की बात करता हूँ, तो इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता। मंदिर में किसी देवी-देवता की पूजा करना हिंदुओं की मूल आस्था का एक हिस्सा है। इसलिए, उस देवी-देवता के जो भी मुख्य गुण हैं, वे उस मंदिर में की जाने वाली पूजा का ही एक अंग होते हैं। जब मैं किसी मंदिर में जाता हूं, तो मैं वहां चुनौती देने के लिए नहीं जाता। मैं तो अपनी आस्था को व्यक्त करने के लिए जाता हूं। मैं किसी मंदिर या किसी भी पूजा स्थल पर, वहां के देवी-देवता के चरित्र पर सवाल उठाने के लिए नहीं जाता। मैं वहां इस पर प्रश्न करने के लिए नहीं जाता। वे मंदिर में इस तरह नहीं आ सकते, जैसे कोई संग्रहालय में जाता हो।

10:33 AM17 अप्रैल 2026

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जस्टिस नागरत्ना -क्या अदालत “पीड़ित व्यक्ति” की शर्त जोड़ेगी-यानी वही व्यक्ति मामला उठाए जो सीधे प्रभावित हो?

क्या अदालत “पीड़ित व्यक्ति” (जिसे इस मामले से सच में नुकसान या परेशानी हो) की शर्त जोड़ेगी—यानी वही व्यक्ति मामला उठाए जो सीधे प्रभावित हो?और क्या ऐसा हो सकता है कि कोई गैर-आस्तिक (जो उस धर्म को नहीं मानता) किसी धार्मिक प्रथा की सही-गलत या तर्कसंगतता पर सवाल उठा सके? एडवोकेट धवन- कार्रवाई का अधिकार किसी आस्तिक के पास होगा। मान लीजिए, कोई ‘इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन’ है जो यह कहती है कि वह एक संस्था है और वह अपना यह दावा पेश करती है, तो हो सकता है कि उसके पास मुकदमा दायर करने का अधिकार हो। मुझे यह जानकारी मिली है कि कोई व्यक्ति किसी आस्तिक की ओर से भी पेश हो रहा है। उस प्रश्न पर अलग से निर्णय लिया जाएगा।

10:18 AM17 अप्रैल 2026

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धवन बोले- हमें धार्मिक संस्था की रक्षा करने की जरूरत है

एडवोकेट धवन- मैं जो कह रहा हूँ, वह यह है कि ‘संप्रदाय’ एक ऐसा गलत नाम है जिसे हमने दुर्भाग्यवश अपना लिया है। असल में हमें जिस चीज़ की रक्षा करने की ज़रूरत है, वह है धार्मिक संस्था।

10:08 AM17 अप्रैल 2026

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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- जिन मंदिरों का कोई विशिष्ट संप्रदाय नहीं है, क्या उन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी

धवन: संप्रदाय और पंथ को भारतीय अर्थ में समझा जाना चाहिए, न कि आयरिश अर्थ में। मुझे ‘अब्राहमिक धर्म’ के लिए इस्तेमाल किया गया यह वाक्यांश पसंद नहीं है। अब्राहम, अगर कभी उनका अस्तित्व था भी, तो वे बहुत पहले ही विलुप्त हो चुके हैं। कुछ ऐसे धर्म भी हैं जिन्हें ‘किताबिया धर्म’ कहा जाता है, जिनकी अलग-अलग तरह की व्याख्याएं हैं।

इसकी व्याख्या इस तरह से की जानी चाहिए कि इसमें आस्था से जुड़ी सभी संस्थाएं शामिल हों। हमें संप्रदाय-पंथ के संकीर्ण अर्थों में नहीं घसीटा जाना चाहिए। यह उस अर्थ में लागू नहीं होता। जब आप इसकी व्याख्या करते हैं, तो आपको यह कहना चाहिए कि इसमें सभी समूह और आस्था से जुड़ी सभी संस्थाएं शामिल हैं, चाहे वह कोई आदिवासी धर्म हो, कोई चर्च हो, कोई मस्जिद हो, या कुछ भी और हो।

जस्टिस नागरत्ना: इसका मतलब है कि जिन मंदिरों का कोई विशिष्ट संप्रदाय नहीं है, उन्हें कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी?

10:03 AM17 अप्रैल 2026

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सवाल प्रवेश का नहीं, अधिकार और चुनाव का भी है

एड. धवन: नैतिकता से आपका क्या मतलब है? लोकप्रिय नैतिकता बहुत लचीली हो जाती है, और हमें इस बात को लेकर पक्का होना चाहिए कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं। तीसरा मुद्दा, जो हमारे ज्यादा करीब है, यानी ऐसी नैतिकता जिसे एक सभ्य समाज स्वीकार नहीं करेगा।

एक बार जब आप परिसर में प्रवेश कर लेते हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि आपका अधिकार वहीं समाप्त हो गया और किसी विशेष संप्रदाय का अधिकार शुरू हो गया। आपका अधिकार प्रार्थना करने का है, और उस अधिकार को समायोजित किया जाना चाहिए।

यह केवल ‘प्रवेश मात्र’ का मामला नहीं है। इसमें ‘चुनाव’ का सवाल भी शामिल है। अक्सर यह कहा जाता है कि आप किसी दूसरे मंदिर में जा सकते हैं। लेकिन, बात यह नहीं है। मैं तो इसी मंदिर में जाना चाहता हूं, मेरे लिए यह सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है।

दूसरा पहलू यह है कि प्रवेश करने का मेरा अधिकार आखिर क्या है? क्या इसका मतलब केवल मंदिर की बाहरी सीमा को पार करना भर है? नहीं। यह ‘पूजा करने का अधिकार’ है। मेरे पास यही अधिकार है। मुझे मंदिर के किसी भी हिस्से में जाने का अधिकार है, हां, शायद ‘गर्भगृह’ में जाने का नहीं।

09:38 AM17 अप्रैल 2026

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धार्मिक मामलों का प्रबंधन, धार्मिक विश्वासों की ही एक बाहरी अभिव्यक्ति

जस्टिस जॉयमाल्या बागची: क्या आप इस बात से सहमत होंगे कि आर्टिकल 26(b) के तहत धार्मिक मामलों का प्रबंधन करना, आर्टिकल 25(1) के दूसरे हिस्से में दिए गए शब्दों, ‘धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता’ के साथ पूरी तरह से मेल खाता है? यहां मेल खाने का मतलब संस्थागत और व्यक्तिगत के संदर्भ में नहीं, बल्कि उसकी गतिविधि के संदर्भ में है। आप इन बातों को किस तरह देखते हैं?

एड. धवन: मैं आर्टिकल 26 को आर्टिकल 25 के अधीन नहीं मानूंगा। आपको यह सवाल भी पूछना चाहिए कि क्या कोई ‘पंथ’ केवल व्यक्तियों का एक समूह मात्र है? मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि धार्मिक मामलों का प्रबंधन करना, दरअसल धार्मिक विश्वासों की ही एक बाहरी अभिव्यक्ति है।

जस्टिस बागची: तो फिर आर्टिकल 25(1) के तहत धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने में और आर्टिकल 26(b) के तहत धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने में क्या कोई मेल नहीं होगा?

एड. धवन: यहां अहम शब्द है- ‘मेल’। कोई भी चीज, बिना किसी अनुच्छेद के अधीन हुए, उस अनुच्छेद से ‘रंग’ (स्वरूप) नहीं ले सकती। क्योंकि स्वशासन का मतलब ही यह है कि वह किसी अन्य प्रावधान के अधीन न हो। यह बात शाब्दिक रूप से नदारद है…।

जस्टिस बागची: अगर आपकी दलील मान ली जाए, तो ‘अन्य प्रावधानों के अधीन’ होने की शर्त के कारण व्यक्ति पर लागू होने वाली अधीनता, और साथ ही आर्टिकल 25(2)(b) के तहत विधायिका की सक्षमकारी शक्तियों से संबंधित सुरक्षा ये सभी बातें निरर्थक हो जाएंगी; क्योंकि तब कोई भी व्यक्ति आर्टिकल 26(2) के तहत किसी संस्था के माध्यम से उन्हीं अधिकारों का दावा कर सकेगा।

09:33 AM17 अप्रैल 2026

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आर्टिकल 26 के बिना सभी धर्म केवल कर्मकांडों तक ही सिमट जाएंगे

एडवोकेट धवन: आर्टिकल 26 के बिना हम क्या करेंगे? सभी धर्म केवल कर्मकांडों तक ही सिमटकर रह जाएंगे। इसलिए, समय के साथ-साथ धर्मों को बनाए रखने के लिए आर्टिकल 26 सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है।

हम सभी नाजरेथ के यीशु के बारे में बात करते हैं। ‘पहाड़ी उपदेश’ वगैरह… लेकिन जब संत पॉल आए और उन्होंने यूनानियों को संबोधित करते हुए यूनानी परलोक-विद्या और यहूदी औचित्य का इस्तेमाल किया, तो उन्होंने कहा कि ‘अज्ञात ईश्वर’ ही आपका ईश्वर है। इसी तरह चर्च का विकास हुआ। क्या चर्च के बिना ईसाई धर्म का अस्तित्व होता? ऐसा नहीं होता। एक संस्था के तौर पर चर्च ही ईसाई धर्म को निरंतर बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है।

इस्लाम की कई बातों के बारे में भी यही सच है, और निश्चित रूप से हिंदू धर्म के बारे में भी यही सच है। आर्टिकल 26 सिर्फ हिंदू आस्था को ही दायरे में नहीं लेता; यह सभी संस्थाओं को, बिना किसी भेदभाव के, अपने दायरे में लेता है। इसलिए यह इतना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

09:24 AM17 अप्रैल 2026

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जस्टिस अमानुल्लाह ने पूछा- क्या हमें अंतरात्मा से जुड़े मामलों में भी दखल नहीं देना चाहिए

जस्टिस अमानुल्लाह: आप कहते हैं अंतरात्मा की स्वतंत्रता बहुत व्यापक है। तो सवाल यह है कि क्या आप यह कहना चाहते हैं कि कोर्ट (जज) ऐसे मामलों में कोई नियम या सिस्टम ही न बनाए, क्योंकि धर्म हर व्यक्ति के लिए बहुत निजी मामला होता है?

लेकिन जब कोर्ट किसी मामले पर फैसला करती है, तो उसे सिर्फ धर्म के नजरिए से नहीं, बल्कि उससे ऊपर उठकर संविधान के हिसाब से संतुलन बनाकर देखना होता है। यानी कोर्ट को यह समझना होता है कि उस फैसले का समाज पर क्या असर पड़ेगा।

इसलिए, क्या हमें उन सभी चीजों के बारे में नहीं लिखना होगा जिन्हें धर्म के तौर पर पेश किया गया है, जहां यह कहा जाता है कि इसे मत छूना?

आखिर कोर्ट एक संवैधानिक संस्था है, तो क्या उसे अंतरात्मा और उससे जुड़े मामलों में भी दखल नहीं देना चाहिए, ताकि सब कुछ संविधान के अनुसार चले? और यह जरूरी नहीं है कि हर मामला सिर्फ धर्म तक सीमित हो, कई बार यह अंतरात्मा और व्यक्तिगत अधिकारों का अलग मुद्दा भी हो सकता है।

09:18 AM17 अप्रैल 2026

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छुआछूत से जुड़े आर्टिकल 17 की अवहेलना धर्म और कोर्ट भी नहीं कर सकता

एडवोकेट धवन: संविधान के कुछ प्रावधान एक अलग ही स्थिति रखते हैं। अस्पृश्यता से जुड़े आर्टिकल 17 को ही लें। यह एक पूर्ण आदेश है। कोई भी कोर्ट, कोई भी धर्म आर्टिकल 17 के आदेश की अवहेलना कभी नहीं कर सकता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि धार्मिक मामलों का प्रबंधन कौन करता है, इस आदेश का पालन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। यही बात आर्टिकल 14 के बारे में भी कही जा सकती है, जो समानता की बात करता है।

09:08 AM17 अप्रैल 2026

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कोर्ट का सवाल- क्या अंतरात्मा धर्म से भी बढ़कर कोई चीज है

जस्टिस नागरत्ना: क्या आप यह कहना चाहते हैं कि अंतरात्मा धर्म से भी बढ़कर कोई चीज है।

एडवोकेट धवन: अंतरात्मा को उसका स्वरूप या रंग धर्म से ही मिलता है। इसे धर्म से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता। कई बार, अंतरात्मा की अभिव्यक्ति बाहरी रूप में हो सकती है, लेकिन फिर भी मैं उस बाहरी अभिव्यक्ति और अंतरात्मा के मूल स्वरूप के बीच एक स्पष्ट अंतर करूंगा। अंतरात्मा हम सभी के भीतर मौजूद होती है, और ‘स्वतंत्र रूप से’ शब्द इसे धर्म से जोड़ता है। यही वह सवाल है, जिसे यहां उठाया गया है।

08:58 AM17 अप्रैल 2026

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कानून की सीमा में रहकर धर्म की बातों का विरोध किया जा सकता है

एडवोकेट धवन: कोई व्यक्ति किसी विशेष आस्था से जुड़ा हो सकता है, लेकिन वह उस आस्था से असहमति रखने वाला भी हो सकता है। वह कह सकता है कि वह उस आस्था को मानता है, लेकिन उसे उस आस्था से जुड़ी अपनी कुछ दिक्कतें हैं। खुद हिंदू धर्म में ही ऐसे लोगों की सीरीज देखने को मिलती है, जो मुख्यधारा से कुछ दूरी बनाकर चलते हैं। ऐसा हर समय होता रहता है। यह बात उन लोगों पर भी लागू होती है, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज के चलते किसी बात का विरोध करते हैं।

इसलिए, ‘स्वतंत्र रूप से’ का अर्थ है- किसी धर्म का पालन करने का अधिकार, किसी धर्म का पालन न करने का अधिकार और यहां तक कि यह कहने का अधिकार भी कि उस धर्म के भीतर कोई बात गलत है; बशर्ते यह सब कानून की सीमाओं के भीतर हो।

इसलिए, नेकनीयती भरा आचरण और सम्मान बेहद जरूरी हैं। ये दोनों ही धर्म में सुधार या बदलाव लाने के लिए बुनियादी तत्व हैं।

08:53 AM17 अप्रैल 2026

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धर्म पर सवाल उठाने की आजादी है, लेकिन सम्मानजनक ढंग से

एडवोकेट धवन: पिछले चार दिनों से पूरी चर्चा आर्टिकल 25 और 26 को समझने पर केंद्रित रही है। इस सुनवाई का मुख्य केंद्र बिंदु यही है। इसलिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

अब, मैं अनुच्छेद 25(1) पर आता हूं। यह कहता है कि सभी व्यक्तियों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता और स्वतंत्र रूप से आचरण करने के अधिकार का समान हक है। जब हम अंतरात्मा की स्वतंत्रता की बात करते हैं, तो हम एक बहुत बड़ा मुद्दा उठा रहे होते हैं।

इसके तहत मुझे किसी भी चीज पर सवाल उठाने की आजादी है। मैं राज्य पर सवाल उठा सकता हूं, मैं किसी धर्म पर सवाल उठा सकता हूं, लेकिन यह सम्मानपूर्वक किया जाना चाहिए।

08:47 AM17 अप्रैल 2026

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संदेह है कि किसी प्रथा से वंचित करना, आस्था को बदल सकता है

एडवोकेट धवन: विचारों में स्पष्ट मतभेद है, और वही मतभेद फिर से हो सकता है। एक अहम सवाल यह भी था कि क्या इस मामले में अयप्पा प्रथा एक ‘संप्रदाय’ बनाती है। यदि कोई चीज संप्रदाय नहीं है, तो वह अनुच्छेद 26 का संरक्षण खो देती है। इसलिए, अयप्पा मंदिर भी वह संरक्षण खो देगा।

जस्टिस चंद्रचूड़ का यह भी मानना था कि महिलाओं का बहिष्कार आर्टिकल 17 के तहत छुआछूत का ही एक रूप है। जस्टिस मल्होत्रा ​​ने इस बात को स्वीकार नहीं किया।

‘आवश्यक प्रथाओं’ के लिए एक नए मापदंड का भी संकेत दिया गया; वो यह कि क्या किसी प्रथा से वंचित करना किसी व्यक्ति की आस्था को बदल देगा।

यह एक बहुत ही संकीर्ण मापदंड है। इसका असर यह होगा कि आपको यह दिखाना होगा कि आपकी आस्था किस प्रकार बदलेगी, और केवल तभी उस प्रथा को ‘आवश्यक’ माना जाएगा। मेरे विचार में, यह मापदंड बहुत ही संकीर्ण है।

08:37 AM17 अप्रैल 2026

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पिछले फैसलों में राय थी- महिलाओं को पूजा से बाहर रखना जरूरी प्रथा नहीं थी

एडवोकेट धवन: मैं जस्टिस नागरत्ना के उठाए गए उस सवाल पर आता हूं कि इस मामले का सबरीमाला से क्या संबंध है, और वास्तव में किन कारणों से ये आज हमारे सामने आए हैं।

हुआ यह कि जस्टिस खानविलकर, जो बहुमत के साथ थे और जिन्होंने चीफ जस्टिस मिश्रा के फैसले का समर्थन किया था, बाद में उन्होंने अपना रुख बदल लिया। चीफ जस्टिस मिश्रा की जगह जस्टिस गोगोई आए। तब इंदु मल्होत्रा ​​प्रभावी रूप से बहुमत का हिस्सा बन गईं, जो इस रेफरेंस के लिए जिम्मेदार है।

पिछले फैसले में, जस्टिस मिश्रा, जस्टिस खानविलकर और जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह राय दी थी कि महिलाओं को पूजा से बाहर रखना कोई जरूरी प्रथा नहीं थी। जस्टिस नरीमन ने इस आधार पर आगे कदम बढ़ाया कि यह एक जरूरी प्रथा थी और इस तरह उन्होंने जस्टिस मल्होत्रा ​​से सहमति जताई।

08:21 AM17 अप्रैल 2026

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याचिकाकर्ता बोले- सामाजिक सुधार का अर्थ न हो, तो हम उलझकर रह जाएंगे

एडवोकेट राजीव धवन: इसलिए मैं यह कहता हूं कि आस्था या विश्वास समय के साथ हमेशा बदलते रहते हैं। यह बदलाव सिर्फ किसी कानून या अधिनियम के बन जाने से नहीं आता; बल्कि यह बदलाव तो लोगों के बीच से ही उभरकर आता है। यहां एक उदाहरण दिया गया था कि कैसे एक महिला ‘आर्कबिशप ऑफ कैंटरबरी’ (चर्च की सर्वोच्च पादरी) बनी। मैंने खुद चर्च के प्रमुख, आर्कबिशप रैमसे के साथ इस पर बहस की थी। मैंने उनसे पूछा था कि चर्च में कोई महिला पादरी क्यों नहीं है? इस पर उनका जवाब था कि उन्हें अपने साथ अपने पूरे ‘अनुयायी-समूह’ यानी फ्लॉक को लेकर चलना होता है। लीडरशिप का यह एक बहुत ही अहम पहलू है।

हम एक के बाद एक लगातार सामाजिक सुधार करते जा सकते हैं; लेकिन अगर उन सुधारों का कोई वास्तविक अर्थ न हो, और अगर वे लोगों को अपने साथ लेकर न चलें, तो हो सकता है कि हम कहीं न कहीं ‘मुख्य मुद्दे’ को छोड़कर सिर्फ ‘छोटी-मोटी बातों’ में ही उलझकर रह जाएं।

08:04 AM17 अप्रैल 2026

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जादू टोने से जुड़े मामलों का फैसला हिंदू कानून के सिद्धांतों के आधार पर नहीं हो सकता

एडवोकेट धवन: उन 5 पॉइंट्स पर गौर करें जिन्हें मैं उठाना चाहता हूं। ये बुनियादी सवाल हैं। मेरा पहला सवाल है कि भारतीय संविधान को एक सिविलाइजेशन स्टेट के लिए बनाया गया था। अगर आप पूरे यूरोप, सब-सहारा अफ्रीका, रूस, दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों और अमेरिका को एक साथ भी ले लें, तब भी हमारे यहां उन सबसे कहीं ज्यादा विविधता है। इसलिए यह कहा जाता है कि यह संविधान किसी एक ‘राष्ट्र’ के लिए नहीं, बल्कि एक सिविलाइजेशन स्टेट के लिए है। मैं इसमें यह भी जोड़ना चाहूंगा कि यह एक ‘मल्टी सिविलाइजेशन स्टेट’ है।

यह बात बेहद अहम है और इसी ने T.M.A. Pai मामले में 11 जजों की बेंच को दिशा दिखाई थी। यह मामला सिर्फ किसी एक मंदिर या किसी एक आस्था तक सीमित नहीं है; बल्कि यह हर जगह, हर मामले पर लागू होता है।

कोर्ट के फैसले का असर आदिवासी धर्मों पर भी पड़ेगा

आप जो भी फैसला देंगे, उसका असर आदिवासी धर्मों पर भी पड़ेगा। यह इसलिए अहम है क्योंकि इन इलाकों में काफी तकलीफें और परेशानियां हैं। अक्सर हम यह बहस करते हैं कि सामाजिक सुधार से जुड़े प्रावधान वहां लागू होने चाहिए या नहीं। जब बात बाहरी अंधविश्वासों या कुरीतियों के जाहिर होने की आती है, तो क्या वे प्रावधान वहां लागू होने चाहिए या नहीं?

मिसाल के तौर पर, ‘जादू-टोना’ ही देखें, क्या इस पर कानून लागू होना चाहिए? मैंने झारखंड में एक NGO के साथ काम किया है, जहां किसी महिला पर ‘डायन’ होने का आरोप लगाकर उसे बदनाम करने की कुप्रथा आज भी मौजूद है; और इस समस्या से निपटने के लिए वहां कानून लाने की कोशिश भी की गई थी।ऐसे मामलों में हम क्या करें? इन मामलों का फैसला सिर्फ हिंदू कानून के सिद्धांतों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

07:42 AM17 अप्रैल 2026

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कोर्ट का मकसद हर व्यक्ति-हर आस्था के लिए कानून बनाना है

सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने अपनी दलीलें शुरू कीं।

एडवोकेट राजीव धवन: फैसला हर मामले के आधार पर नहीं होना चाहिए, क्योंकि कुछ सिद्धांतों को तय करने की जरूरत है। जस्टिस नागरत्ना की तरफ से कुछ सवाल पूछे गए, जैसे कि क्या ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ एक कानूनी ईजाद है।

जस्टिस अमानुल्लाह ने एक बहुत ही अहम सवाल पूछा कि अगर आपका कोई अंधविश्वास है जिसका कोई बाहरी रूप है, तो क्या हम यह कह सकते हैं कि उस बाहरी रूप को कोर्ट रिव्यू नहीं कर सकता। जस्टिस सुंदरेश ने पूछा कि क्या तर्क आस्था पर लागू होता है?

जस्टिस वराले ने पूछा कि आप किसी भी अयप्पा मंदिर में जा सकते हैं। अब अगर यह पसंद का मामला है और अगर कोई एक मंदिर ऐसा है जिसका खास महत्व है, तो यह एक मंदिर से दूसरे मंदिर में जाने का सवाल नहीं है।

कोर्ट में बैठे जज सिर्फ हिंदू प्रथाओं की रक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनका मकसद हर आस्था, हर अंतरात्मा के मामले के लिए कानून बनाना है।

07:31 AM17 अप्रैल 2026

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महिलाएं मासिक धर्म के दौरान घर के पूजा कक्ष में भी नहीं जातीं, ये बिना लिखा नियम

एड.वेंकटेश: त्रावणकोर-कोचीन मंदिर प्रवेश नियमों का नियम 6 केवल सबरीमाला मंदिर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत के सभी मंदिरों पर लागू होता है। इस नियम के अनुसार जब महिलाएं मासिक धर्म से गुजर रही होती हैं, तो वे अपनी स्वयं की स्वेच्छा और अनुशासन का पालन करते हुए मंदिरों में प्रवेश नहीं करतीं।

यह एक बिना लिखा नियम है, यहां तक कि अपने घरों में भी, वे पूजा-कक्ष में भी नहीं जातीं। यह मेरी निजी आस्था है। मैं शायद इसका कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण न दे पाऊं लेकिन जहां विज्ञान के दायरे खत्म होते हैं, वहीं से आस्था शुरू होती है। दक्षिण भारत की सभी महिलाएं या फिर ये कहें कि ज्यादातर महिलाएं इसे एक धार्मिक अनुशासन के रूप में ही पालन करती हैं।

एड. वेंकटेश की दलीलें पूरी हुई…

07:24 AM17 अप्रैल 2026

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संप्रदाय अपने आप एक व्यक्ति, इसे संवैधानिक संरक्षण मिलने से समझौता नहीं

एड. वेंकटेश: जब संप्रदाय से जुड़े संवैधानिक मुद्दे की बात आती है, तो इसे एक ‘व्यक्ति’ के रूप में ही माना जाता है। वंश-परंपरा को खुद एक ‘व्यक्ति’ के रूप में ही पूजनीय माना जाना चाहिए। यही हमारे पूर्वजों के साथ हमारे जुड़ाव का आधार है। और आर्टिकल 26(b) के तहत इसे संवैधानिक संरक्षण देना ऐसा विषय है जिस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

संविधान का हिंदी टैक्स्ट देखें तो इसका अर्थ यह होगा कि ‘मैं यहां हूं, और मैं एक संप्रदाय की बना रहा हूं।’ बस इसी पॉइंट के आधार पर मेरा मंदिर बाकी मंदिरों से स्पेशल और यूनीक हो जाता है। संविधान बनाने वालों का यह मकसद बिलकुल नहीं रहा होगा कि तमिलनाडु के कुल 40 हजार मंदिरों में से 95% मंदिर ‘संप्रदाय’ (डिनॉमिनेशन) की परिभाषा के दायरे से ही बाहर रह जाएं और केवल ‘सार्वजनिक मंदिर’ बनकर रह जाएं।

‘हिंदुओं के वर्गों’ के विषय पर ‘पंथ’ (सेक्ट) की परिभाषा ‘शिरूर मठ’ मामले में स्पष्ट रूप से दी गई है।

06:54 AM17 अप्रैल 2026

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सबरीमाला में एक ही संप्रदाय भगवान अयप्पा का

एडवोकेट वेंकटेश: मैं नियमित रूप से सबरीमाला जाता हूं। पारंपरिक हिंदू धर्म में, किसी भी तीर्थयात्रा के दौरान, सभी जातियों और समुदायों के बीच के भेद मिट जाते हैं। सभी लोग एक समान ‘वर्ग’ का हिस्सा बन जाते हैं। जब हम सबरीमाला जाते हैं, तो वहां कोई जाति/वर्ग नहीं होता; वहां केवल एक ही चीज होती है जो सबको एक साथ रखती है,वह है भगवान अयप्पा का संप्रदाय, जिसमें सभी तरह के भक्त शामिल होते हैं।

‘संप्रदाय’ शब्द हिंदुओं के सभी वर्गों के आपसी मेल-जोल के लिए इस्तेमाल होता है। यह व्यवस्था स्थिर-जड़ नहीं होनी चाहिए। इसका मतलब है कि हिंदुओं के किसी भी वर्ग को मंदिर में जाने की परमिशन है; लेकिन जब आर्टिकल 26(b) की बात आती है, तो यह अधिकार केवल अपने इंटरनल मैनेजमेंट तक ही सीमित होता है।

इसे ऐसे समझते हैं कि कई लोग सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही देखने आते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मामलों का प्रशासनिक प्रबंधन और संचालन असल में रजिस्ट्रार ही करता है। जो कोई भी वहां जाता है, वह आर्टिकल 26(b) के आधार पर यह दावा नहीं कर सकता कि वह सुप्रीम कोर्ट के मामलों को मैनेज करेगा।

06:49 AM17 अप्रैल 2026

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ऐसी नीति बनाई जाए जिससे दान को भी आर्टिक 25(2)(a) का संरक्षण मिले

एड. वेंकटेश: एक और उदाहरण लेते हैं, दान। दान अपने आप में एक धर्मनिरपेक्ष कार्य हो सकता है। लेकिन धार्मिक दान धर्म के दायरे में आता है और उसमें किसी तरह का दखल नहीं दिया जाना चाहिए। अब यह हो रहा है कि हमने धार्मिक दान के दायरे को बढ़ाकर उसे दान के दायरे में ला दिया है। फिर हम कहते हैं कि यह एक धर्मनिरपेक्ष कार्य है और उसमें दखलअंदाजी शुरू कर देते हैं।

इसलिए एक ऐसी न्यायिक नीति बनाई जानी चाहिए कि एक बार जब कोई मामला धर्म के क्षेत्र में आ जाए तो दान-पुण्य को भी उसके मूल स्वरूप में, आर्टिकल 25(2)(a) के तहत संरक्षण मिले।

06:23 AM17 अप्रैल 2026

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सरकार का धर्म की बाहरी चीजों पर कंट्रोल, मान्यताएं-प्रथाएं तय नहीं कर सकती

एडवोकेट वेंकटेश: मुझे आर्टिकल 25(1) से कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि यह हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था मानने की आजादी देता है। लेकिन अनुच्छेद 25(2)(a) का मतलब सिर्फ इतना है कि सरकार उन चीजों को नियंत्रित कर सकती है जो धर्म से जुड़ी तो हैं, लेकिन असल में आर्थिक, सामाजिक या प्रशासनिक (यानी गैर-धार्मिक) गतिविधियां हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार धर्म के मूल हिस्से (कोर प्रैक्टिस) में दखल दे सकती है।

अगर कोई कानून यह कहकर दखल देता है कि वह व्यवस्था सुधार रहा है, लेकिन असल में यह तय करने लगता है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा “जरूरी” है और कौन-सी नहीं, और इससे लोगों की धार्मिक आजादी कम होती है, तो यह अनुच्छेद 13(2) का उल्लंघन माना जाएगा, यानी ऐसा कानून गलत होगा।

लेकिन हमने जो किया, उससे पूरा सिद्धांत ही उलट गया है। हमने धार्मिक कानून को धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं के साथ जोड़कर पढ़ना शुरू कर दिया, फिर धार्मिक प्रथाओं को एक दायरे में सीमित कर दिया है और धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं में दखल देने का रास्ता खोल दिया है।

06:14 AM17 अप्रैल 2026

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धर्म और राज्य का एक-दूसरे के काम में दखल होता है, यही टकराव स्पष्ट हो

एडवोकेट वेंकटेश: एक ओर तो हम यह दावा करते हैं कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं, क्योंकि हम धार्मिक मामलों में कोई दखल नहीं देते। वहीं दूसरी ओर, हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि राज्य के ‘धर्मनिरपेक्ष पहलुओं’ के दायरे में धर्म का कोई, दखल नहीं होना चाहिए। इन दोनों के बीच कुछ न कुछ ‘टकराव’ और ‘अतिव्याप्ति’ (इंटरनसेक्शन) तो जरूर है। इस दुनिया में कोई भी चीज पूरी तरह ‘निरपेक्ष’ नहीं होती।

लेकिन फिर भी यह टकराव और अतिव्याप्ति बहुत कम होनी चाहिए। बेहद छोटी और साफ-साफ परिभाषित होनी चाहिए। उसी परिभाषा के आधार पर ही, कोर्ट को नियम-कानून स्पष्ट रूप से निर्धारित किए जाने चाहिए।

06:00 AM17 अप्रैल 2026

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फैसले में अंबेडकर ने ‘अस्पृश्यता’ और ‘अस्थायी अपवित्रता’ का अंतर नजरअंदाज किया

एडवोकेट वेंकटेश: मैं खुद से यह सवाल पूछूंगा कि कितनी स्वतंत्रता वास्तव में स्वतंत्रता है। व्यवहार क्या है? समान रूप से हकदार क्या है? अंतरात्मा की स्वतंत्रता और सभी व्यक्तियों की स्वतंत्रता, जो अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़ी है, जिनके लिए संभवतः इस कोर्ट से स्पष्टीकरण और दखल देने की जरूरत है।

धर्मनिरपेक्ष राज्य जो मूल रूप से किसी न किसी तरह से धार्मिक स्वतंत्रता को कम करने की कोशिश करता है, वह अनुच्छेद 25(1) के अलावा बुनियादी संरचना सिद्धांत के खिलाफ है।

अंबेडकर ने ‘अस्पृश्यता’ और ‘अस्थायी अपवित्रता’ के बीच साफ-साफ अंतर किया था। मेरा मानना ​​है कि सबरीमाला फैसले में इस अंतर को नजरअंदाज कर दिया गया, जबकि यह एक अहम पॉइंट है और अंबेडकर के भाषणों से ही यह सामने आया है।

05:51 AM17 अप्रैल 2026

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वेंकटेश ने पूछा- गैर संप्रदायिक मंदिरों का क्या, उनके पास कोई अधिकार नहीं

आर्टिकल 25(2) (a) और (b) का कोई उदाहरण नहीं है और ये अद्वितीय हैं। जो भारतीय संविधान के लिए विशेष रूप से बनाए गए हैं। यदि संप्रदायिक मंदिरों की परिभाषा है और कोई खास वर्ग इसके अंतर्गत आता है, तो गैर-संप्रदायिक मंदिरों का क्या होगा? क्या उनका कोई अधिकार नहीं है? यह सब एक पब्लिक प्लेस की तरह हो जाते हैं जैसे बस स्टैंड, जहां कोई भी आ-जा सकता है।

05:45 AM17 अप्रैल 2026

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धर्म, धार्मिक प्रथा, धार्मिक संस्थाएं, धार्मिक संप्रदाय की एक परिभाषा संभव नहीं

आत्मतम ट्रस्ट की ओर से एडवोकेट एमआर वेंकटेश दलीलें रख रहे हैं।

एडवोकेट वेंकटेश: मैं कहना चाहूंगा वह यह है कि अनुच्छेद 25 में ‘धर्म’ शब्द, अनुच्छेद 25(2)(a) में ‘धार्मिक प्रथा’, अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत ‘हिंदू धार्मिक संस्थाएं’, अनुच्छेद 26 के तहत ‘धार्मिक संप्रदाय’ (डिनॉमिनेशन), और अनुच्छेद 26(2)(b) के तहत ‘धर्म से जुड़े मामले’… ये सभी शब्द अनिश्चित हैं और शायद इन्हें परिभाषित करना संभव नहीं है।

संप्रदाय शब्द लैटिन भाषा के ‘डेनोमिटेनस’ से आया है, जिससे ईसाई धर्म में इस शब्द को एक विशेष संप्रदाय से जोड़ा जा सका। इसे आयरिश संविधान ने अपनाया। इसकी जड़ें काफी हद तक विदेशी हैं, और इसी वजह से हमारी समझ के दायरे में इन शब्दों की अपनी कुछ सीमाएं हैं।

05:05 AM17 अप्रैल 2026

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9 जजों की बेंच कर रही सबरीमाला केस की सुनवाई

05:05 AM17 अप्रैल 2026

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सबरीमाला सहित 5 मामले, जिन पर SC फैसला करेगा

1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं।

2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?

3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है।

4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।

4. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?

05:04 AM17 अप्रैल 2026

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नई गाइडलाइन बन सकती है

05:03 AM17 अप्रैल 2026

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सबरीमाला मंदिर केस की टाइमलाइन, 36 साल से यह मामला अदालतों में

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