डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध बनाने पर विचार करे केंद्र: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- इसके लिए कठोर सजा का प्रावधान भी किया जाए

डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध बनाने पर विचार करे केंद्र:  सुप्रीम कोर्ट ने कहा- इसके लिए कठोर सजा का प्रावधान भी किया जाए


नई दिल्ली4 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह डिजिटल अरेस्ट को आपराधिक कानून में औपचारिक रूप से परिभाषित करने और इसे कठोर सजा के साथ अलग अपराध घोषित करने पर विचार करे।

डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का एक बढ़ता हुआ रूप है, जिसमें जालसाज कानून लागू करने वाले अधिकारियों, अदालती कर्मचारियों या सरकारी एजेंसियों के कर्मियों के रूप में पेश होकर ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए पीड़ितों को डराते हैं। वे पीड़ितों को बंधक बनाकर पैसे देने का दबाव बनाते हैं।

CJI सूर्यकांत,जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी के खिलाफ ठोस सबूतों के आधार पर राय बनने के बाद उसकी संपत्ति को फ्रीज किया जा सकता है।

कानून में बदलाव की जरूरत

अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट एक अपराध के रूप में पहले से ही कानून में परिभाषित है।

उन्होंने अदालत को सूचित किया कि एक अंतर-विभागीय समिति (IDC) सिस्टम में कमियों की पहचान करने के लिए डिटेल्ड रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रही है।

CJI का सुझाव- सबूत मिले तो पॉपर्टी फ्रीज की जा सके

  • CJI ने कहा कि कानून में डिजिटल अरेस्ट को औपचारिक रूप से परिभाषित करने की जरूरत है
  • इसमें जबरन वसूली और डकैती के तत्व भी शामिल हैं। इसे गंभीर परिणामों वाले एक अलग अपराध के रूप में परिभाषित करना चाहिये।
  • यह प्रावधान भी हो कि जब आरोपी के खिलाफ कुछ सबूत मिल जाएं तो उसकी संपत्ति फ्रीज की जा सके।

डीपफेक और ऑनलाइन अपराधों पर चिंता

जस्टिस बागची ने डीपफेक के खतरे को रेखांकित किया और कहा कि ऐसे उभरते ऑनलाइन अपराधों को परिभाषित करने के लिए सरकार को पहल करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अब हमारे पास डीपफेक है। इसका उपयोग धोखाधड़ी के लिए किया जा सकता है। आप मौजूदा कानून के तहत हैं, लेकिन आपको इसे और बेहतर बनाने की जरूरत है।

आर्टिकल 142 के तहत हम किसी अपराध को परिभाषित नहीं कर सकते।

सॉलिसिटर जनरल बोले- सरकार कानून बना रही है

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार डीपफेक और डिजिटल अरेस्ट से निपटने के लिए एक कानून पर काम कर रही है।

उन्होंने बताया कि एक ड्राफ्ट बिल तैयार किया जा रहा है, जो संभवतः डिजिटल अरेस्ट, डीपफेक और अन्य ऑनलाइन अपराधों को कवर करेगा।

सीबीआई कर रही है बड़े मामलों की जांच

अटॉर्नी जनरल ने आगे कहा कि सीबीआई पहले से ही 10 करोड़ रुपए और उससे अधिक के नुकसान वाले लगभग 20 बड़े डिजिटल धोखाधड़ी मामलों की जांच कर रही है, जबकि शेष मामलों की जांच राज्य पुलिस कर जा रही है।

उन्होंने RBI को मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करने का निर्देश देने की मांग की, ताकि साइबर धोखाधड़ी में इस्तेमाल होने वाले संदिग्ध खातों को अस्थायी रूप से होल्ड पर रखा जा सके।

अदालत ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को शिकायत निवारण मॉड्यूल और मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल तुरंत ऑपरेश में लाने का निर्देश देने की मांग पर विचार किया।

बेंच ने कहा कि वह बुधवार को इस मामले में निर्देश पारित करेगी।

गृह मंत्रालय की समिति कर रही काम

इससे पहले, गृह मंत्रालय (MHA) ने कोर्ट को सूचित किया था कि उसने कमियों को दूर करने और साइबर अपराध पीड़ितों के लिए वास्तविक समय में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समिति (IDC) का गठन किया है।

16 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल के मार्गदर्शन में अंतर-विभागीय परामर्श का आदेश दिया था।

12 जनवरी को गृह मंत्रालय की स्थिति रिपोर्ट में CBI, RBI, दूरसंचार विभाग और शीर्ष IT मंत्रालयों को शामिल करते हुए एक मल्टी एजेंसी ऑपरेशन की जानकारी दी गई।

इसका उद्देश्य फर्जी दस्तावेजों और डिजिटल अरेस्ट की रणनीति का उपयोग करने वाले अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट को खत्म करना है।

CBI ने दिल्ली का हाई-प्रोफाइल धोखाधड़ी मामला हाथ में लिया

CBI ने कोर्ट को बताया कि ये घोटाले अक्सर संगठित और अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध सिंडिकेट करता है। एजेंसी अब अंतरराष्ट्रीय मॉड्यूल को खत्म करने के लिए इंटरपोल चैनलों का उपयोग कर रही है। गृह मंत्रालय ने विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) की अध्यक्षता में एक IDC बनाई गई है।



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