पंजाब कांग्रेस में बड़ी बगावत के आसार: प्रधान न बनाने पर चन्नी ने मीटिंग बुलाई, सवाल- क्या पार्टी छोड़ेंगे?; रंधावा भी चुप, सांसद तिवारी भी नाराज – Ludhiana News

पंजाब कांग्रेस में बड़ी बगावत के आसार:  प्रधान न बनाने पर चन्नी ने मीटिंग बुलाई, सवाल- क्या पार्टी छोड़ेंगे?; रंधावा भी चुप, सांसद तिवारी भी नाराज – Ludhiana News


पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले किए बदलाव को लेकर कांग्रेस में बगावत के आसार बन गए हैं। पूर्व CM चरणजीत चन्नी और सांसद सुखजिंदर रंधावा अमरिंदर राजा वड़िंग के प्रधान पद में बदलाव न होने से नाराज हैं। यही वजह है कि दोनों नेताओं ने अभी तक हाईकमा

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यहां तक कि सोशल मीडिया पोस्ट तक नहीं डाली। चन्नी ने तो घर में समर्थकों की कल 11 बजे मीटिंग बुला ली है। ताजा बदलाव में कांग्रेस ने चन्नी को इलेक्शन कैंपेन कमेटी (चुनाव प्रचार समिति) का चेयरपर्सन नियुक्त किया है। सुखजिंदर रंधावा को टिकट बंटवारे वाली कोर कमेटी का चेयरमैन बनाकर खुश करने की कोशिश की गई है।

कांग्रेस सोर्सेज के मुताबिक पार्टी के करीब 10-15 बड़े नेता नई टीम बनने के बाद ज्यादा नाराज हैं। वह ठीक उसी तरह वड़िंग के खिलाफ कैंपेन चला सकते हैं जैसे कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने के लिए 2021 में नवजोत सिद्धू ने चलाई थी। इस नाखुशी की बड़ी वजह कांग्रेस का ट्रेंड है, जिसमें पंजाब में CM चेहरा न होने पर ज्यादातर प्रधान पद वाले नेता को ही बहुमत मिलने पर मुख्यमंत्री बनाया जाता है।

वहीं चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी ने भी उनको किनारे किए जाने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने यहां तक लिख दिया कि काश, मेरे पास व्यक्तियों और संस्थाओं की असुरक्षा (हीनभावना) का भी कोई प्रतिरोधक (एंटीडोट/विषनाशक) होता।

किसकी क्या नाराजगी, उस पर क्या कहा:-

  • चन्नी की कुर्सी फाइनल थी, 2022 से डरी पार्टी: कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक चरणजीत चन्नी खुद प्रधान पद चाहते थे। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक इसको लेकर रजामंदी भी हो चुकी थी लेकिन आखिरी वक्त में कांग्रेस ने जट्‌टसिखों की नाराजगी के डर से राजा वड़िंग को ही प्रधान बने रहने दिया। 2022 में चरणजीत चन्नी की अगुआई में लड़कर कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी। चन्नी खुद मुख्यमंत्री रहते 2 सीटों से चुनाव हार गए थे।
  • रंधावा का तर्क, जट्‌टसिख ही बनाना तो मैं क्यों नहीं: कांग्रेस सोर्सेज के मुताबिक रंधावा इस वजह से नाराज बताए जा रहे हैं कि अगर जट्‌टसिख ही प्रधान रखना था तो उन्हें क्यों नहीं बनाया गया। वह भी तब, जबकि वड़िंग की अगुआई में कांग्रेस पहले तरनतारन उपचुनाव बुरी तरह हारी। फिर लोकल बॉडी चुनाव में वड़िंग अपने ही गृहक्षेत्र गिद्दड़बाहा में पार्टी को नहीं जिता सके। इससे पहले 2021 में भी कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने के बाद हाईकमान की मंजूरी मिलने के बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया।
  • मनीष तिवारी बोले- जो होगा, सो होगा: चंडीगढ़ सांसद मनीष तिवारी ने उन्हें किनारे किए जाने को लेकर सोशल मीडिया (X) पर लिखा- काश मेरे पास व्यक्तियों और संस्थाओं की असुरक्षा (हीनभावना) का भी कोई प्रतिरोधक (एंटीडोट/विषनाशक) होता। हालांकि पिछले 45 वर्षों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मुझे बहुत कुछ दिया है और मैंने भी अपने युवा जीवन को दशकों तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सेवा में समर्पित किया है। आखिर में तिवारी ने फेमस अंग्रेजी सॉन्ग की पंक्ति लिखी, ‘Que sera, sera, Whatever will be, will be…’, जिसका हिंदी अर्थ ‘जो होगा, सो होगा’ या ‘जो होना है, वह होकर रहेगा’ है।

मनीष तिवारी की सोशल मीडिया पोस्ट:-

बिट्‌टू बोले- चन्नी को प्रधान बनाने की चिट्‌ठी लिखने वाले वड़िंग के साथ कैसे काम करेंगे केंद्रीय राज्य मंत्री व BJP नेता रवनीत सिंह बिट्‌टू ने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए ट्वीट किया है कि कांग्रेस में जिनको इन कमेटियों में जगह नहीं मिली है वो खुद को कांग्रेसी न समझे। उन्होंने कहा कि इस कमेटी में चेयरमैन व को चेयरमैन बनाया गया है। इसके अलावा कोई पद ही नहीं दिए। बिटटू ने कहा कि ज्यादातर लोग चन्नी को प्रधान बनाने के लिए पंजाब के कई नेताओं ने चिट्‌ठी हाईकमान को लिखी थी। अब राजा वड़िंग को प्रधान रख दिया तो वो लोग कैसे वड़िंग के साथ काम करेंगे। बिट्‌टू ने दावा कि कांग्रेस के सीनियर लीडर इससे खुश नहीं हैं।

दिलचस्प बात ये, कांग्रेस में फिर 2022 जैसे हालात

कांग्रेस में 2022 में पंजाब में जैसे हालात हुए थे, वही स्थिति 2027 के चुनाव से पहले भी होने लगी है। तब कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने के बाद नवजोत सिद्धू मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन हाईकमान नहीं माना। इसके बाद हाईकमान ने सुखजिंदर रंधावा का नाम फाइनल किया तो सिद्धू नाराज हो गए।

उन्होंने कहा कि अगर जट्‌टसिख सीएम बनेगा तो मैं बनूंगा वर्ना किसी दूसरे वर्ग से बना दो। जिसके बाद चरणजीत चन्नी मुख्यमंत्री बन गए। इससे नाराज होकर नवजोत सिद्धू घर बैठ गए। पंजाब प्रधान होने के बावजूद उन्होंने कहीं भी प्रचार तक नहीं किया।

मौजूदा वक्त में अब राजा वड़िंग प्रधान पद पर हैं। कांग्रेस में माना जाता है कि जो चुनाव के वक्त प्रधान पद पर होता है, वही मुख्यमंत्री भी बनता है। ऐसे में चन्नी और रंधावा नाराज बताए जा रहे हैं। ऐसे में साफ है कि चुनाव के वक्त इन दोनों नेताओं की भूमिका नवजोत सिद्धू के 2022 की तरह सीमित रह सकती है। आखिर में इसका नुकसान कांग्रेस को ही हो सकता है।

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी।- फाइल फोटो

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी।- फाइल फोटो

2022 विधानसभा चुनाव में हार से डरी कांग्रेस 2022 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने जुलाई 2021 में सुनील जाखड़ को प्रधान पद से हटाकर जट्ट सिख नेता नवजोत सिंह सिद्धू को प्रधान बनाया। कुछ समय बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर सितंबर में चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया। नवजोत सिंह सिद्धू ने इस फैसले से नाराज होकर प्रधान पद से इस्तीफा दिया हालांकि बाद में उन्हें मना लिया गया और उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया।

चुनाव के दौरान सिद़्धू और चन्नी गुट अलग-अलग दिखे, जिसका खामियाजा पार्टी को हार के रूप में झेलना पड़ा। इस बार कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन करने से डर गई। कांग्रेस को डर था कि राजा वड़िंग को प्रधान से हटाया तो उनका गुट सिद्धू की तर्ज पर पार्टी के खिलाफ काम करता। इसलिए पार्टी हाईकमान ने उन्हें पद से हटाने की हिम्मत नहीं दिखाई।

सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर किसको कहां क्या जिम्मेदारी दी गई…

1. दलित वोट बैंक पर सबसे बड़ा दांव: पंजाब में करीब 31% दलित वोट है। पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से दलित नेता अहम पदों पर नहीं थे। चन्नी इस मामले को खुलकर पार्टी फोरम में उठा चुके थे। इसके अलावा तरनतारन उपचुनाव में राजा वड़िंग के पूर्व गृहमंत्री बूटा सिंह पर दिए बयान से पार्टी बैकफुट पर आ गई थी। ऐसे में पार्टी ने 2027 के लिए जो रणनीति बनाई है उसमें दलित समुदाय से आने वाले चन्नी को सुपर बॉस बनाया है। इसके अलावा दलित समुदाय के अन्य नेताओं को नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी हैं।

पार्टी ने चन्नी को कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाकर स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी का पूरा चुनाव प्रचार एक कद्दावर दलित चेहरे के इर्द-गिर्द घूमेगा। यह कदम आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के दलित वोट बैंक में सीधी सेंधमारी के लिए है। डॉ. अमर सिंह भी दलित सिख समुदाय से आते हैं। लोकसभा सांसद और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. अमर सिंह को मेनिफेस्टो कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया गया है। इसके पीछे रणनीति यह है कि दलित समुदाय से जुड़े बुनियादी मुद्दों, छात्रवृत्तियों, और लोक-लुभावन वादों को घोषणापत्र में मुख्य और तकनीकी रूप से ठोस जगह दी जा सके।

इसके अलावा सुखविंदर सिंह डैनी मजहबी सिख समुदाय से आते हैं। पार्टी ने इन्हें वर्किंग प्रेसिडेंट की जिम्मेदारी दी है। माझा और मालवा बेल्ट में मजहबी सिख समुदाय और दलित युवाओं को सीधे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से जोड़ने के लिए यह नियुक्ति बेहद अहम मानी जा रही है। इसके अलावा हिंदू दलित नेता राजकुमार वेरका को भी वर्किंग प्रेसिडेंट बनाया है।

2. जट सिख समुदाय को मुख्य कमान: पंजाब में जट सिखों की वोट 19% के आसपास मानी जाती है और यही समुदाय पंजाब की सत्ता की धुरी रहता है। दलित सिख चेहरे चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव में अहम जिम्मेदारी दी है तो जट्‌ट सिख नेता व लुधियाना से सांसद अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रधान और प्रताप सिंह बाजवा को एलओपी के पद पर बरकरार रखा है। वहीं कांग्रेस में सबसे तेज तर्रार जट्‌ट सिख नेता व पूर्व डिप्टी सीएम सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी का चेयरमैन बनाया है।

यह कमेटी टिकट वितरण, चुनाव के लिए रणनीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाएगी। वहीं कई जट्‌ट सिख नेताओं को कमेटियों में को-चेयरपर्सन की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी ने सुखपाल सिंह खैहरा, राणा गुरजीत सिंह, परगट सिंह, कुलजीत सिंह नागरा, अंगद सिंह सैनी और सुखबिंदर सिंह सरकारिया विभिन्न कमेटियों में बतौर को-चेयरमैन फिट किया है।

3. शहरों में हिंदू चेहरों को कमान: कांग्रेस ने पंजाब के 38 प्रतिशत हिंदू वोट बैंक को साधने के लिए हिंदू नेताओं को भी अहम जिम्मेदारियां दी हैं। हिंदू वोट ज्यादातर शहरों में है, इसलिए पार्टी ने शहरी नेताओं को ही प्राथमिकता दी है। विजय इंदर सिंगला को इलेक्शन मैनेजमेंट एंड को-ऑर्डिनेशन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया है। इसका सीधा मतलब है कि चुनाव का पूरा मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स, चुनावी फंड और नेताओं के बीच तालमेल बिठाने की चाबी एक हिंदू नेता के हाथ में रहेगी।

इसके अलावा अमृतसर के ओपी सोनी, लुधियाना के भारत भूषण आशु दोनों को को-चेयरमैन बनाया गया है। वहीं हिंदू दलित चेहरे राज कुमार को वेरका वर्किंग प्रेसिडेंट बनाया गया है। इसके जरिए जालंधर, अमृतसर और लुधियाना जैसे बड़े हिंदू-बहुल और व्यापारिक शहरी क्षेत्रों को पूरी तरह अपने पाले में रखने की कोशिश की गई है।

4. ओबीसी और अल्पसंख्यक संतुलन: पार्टी ने ओबीसी व अल्पसंख्यक समुदाय को भी इलेक्शन कमेटियों में जगह दी है। संगत सिंह गिलजियां जो कि पिछड़ा वर्ग से आते हैं और उन्हें वर्किंग प्रेसिडेंट का पद दिया गया है, ताकि ओबीसी वोट बैंक को प्रतिनिधित्व का अहसास कराया जा सके। रजिया सुल्ताना मुस्लिम यानि अल्पसंख्यक समुदाय से आती हैं और उन्हें अल्पसंख्यक चेहरे के तौर पर उन्हें इलेक्शन मैनेजमेंट कमेटी में को-चेयरपर्सन बनाया गया है, ताकि मुस्लिम अल्पसंख्यकों का झुकाव कांग्रेस की तरफ बना रहे।

रिजनल इक्वेशन बैलेंसिंग फॉर्मूले पर किसको क्या जिम्मेदारी दी गई जानिए…

1. मालवा क्षेत्र (69 सीटें): पंजाब की सत्ता का रास्ता मालवा से ही तय होता है, क्योंकि यहां सबसे ज्यादा 69 सीटें हैं। जो पार्टी मालवा फतह करती है, चंडीगढ़ के सचिवालय पर उसी का कब्जा होता है। यही कारण है कि कांग्रेस ने मालवा को चार बड़े और मुख्य पद (चेयरमैनशिप) देकर ‘सत्ता की असली चाबी’ सौंपी है।

मालवा में पिछली बार आम आदमी पार्टी ने एकतरफा क्लीन स्वीप किया था। इस बार कांग्रेस चन्नी के दलित कार्ड, सिंगला के हिंदू कार्ड और राजा वड़िंग के युवा जट सिख चेहरे के दम पर मालवा की 69 सीटों पर अपना परचम लहराना चाहती है।

2. माझा क्षेत्र (25 सीटें) : माझा क्षेत्र को हमेशा से कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन यहां शिरोमणि अकाली दल और पंथिक वोट बैंक का भी प्रभाव है। इस बेल्ट में विरोधियों को रोकने के लिए कांग्रेस ने आक्रामक नेताओं को आगे किया है।

3. दोआबा क्षेत्र (23 सीटें) : जालंधर, होशियारपुर और कपूरथला का यह क्षेत्र एनआरआई के प्रभाव और पंजाब में सबसे सघन दलित आबादी के लिए जाना जाता है। यहां संगठनात्मक मजबूती और चेहरों का सही मिश्रण जरूरी था। यहां से पार्टी ने अलग-अलग वर्ग के नेताओं को कमेटियों में जगह दी है।

117 सीटों के चक्रव्यूह को भेदने का मुकम्मल प्लान कांग्रेस आलाकमान की इस नई चुनावी संरचना का अगर एक लाइन में विश्लेषण किया जाए, तो साफ है कि पार्टी ने मालवा को ‘सत्ता की चाबी’ (सभी बड़े चेयरमैन पद), माझा को ‘रणनीति व संगठन की कमान’ (कोर कमेटी और नेता प्रतिपक्ष), और दोआबा को ‘सांगठनिक संतुलन’ (वर्किंग प्रेसिडेंट व दलित-ओबीसी गठजोड़) सौंपकर 117 सीटों के चक्रव्यूह को भेदने की पूरी तैयारी कर ली है। चरणजीत सिंह चन्नी को फ्रंट सीट पर बिठाकर कांग्रेस ने यह भी साफ कर दिया है कि वह 2027 में किसी भी तरह की गुटबाजी से बचकर एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरेगी।

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