फोस एस चौक स्थित श्री निर्मल वेदांत आश्रम में आयोजित 76वें अखिल भारतीय निर्मल वेदांत सम्मेलन में पहुंचे महामंडलेश्वरों, ब्रह्मचारियों और संतों ने अपने प्रवचनों से संगत को निहाल किया। संतों ने कहा कि भले ही कुछ लोग इस संसार को अमीर-गरीब या स्त्री-पुरुष के रूप में बांटते हैं, परंतु अध्यात्म दृष्टिकोण से यह सृष्टि केवल दो प्रकार की है ज्ञानी और अज्ञानी। ज्ञानी सदा सुखी रहता है और अज्ञानी दुखी रहता है।

सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि बुद्धि मच्छर के पास भी होती है, किंतु उसकी बुद्धि सिर्फ दूसरों का खून पीने तक सीमित रहती है। यदि इंसान की बुद्धि का विकास न हो, तो उसमें और मच्छर में क्या अंतर रह जाएगा? विकास का असली मतलब है ‘सबमें परमात्मा को देखना', और यह ज्ञान गुरुओं से मिलता है।

संतों ने बताया कि अज्ञान अनादि काल से चला आ रहा है और इस अंधकार को दूर करने की पावर मात्र ‘गुरुमंत्र' में है। जब एयर और स्काई जैसी शक्तियों को इन आंखों से नहीं देखा जा सकता, तो परमात्मा को भौतिक आंखों से देखने की जिद क्यों?

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जो सुख मिलता है, वह ज्ञान से ही महसूस होता है। जब तक इंसान दूसरों में कमियां ढूंढने में लगा रहता है, तब तक वह दुखी रहता है। जिस दिन इंसान दूसरों को देखना बंद कर अपने भीतर झांकना आरंभ कर देगा, उसी दिन से उसे असली आनंद मिलने लगेगा।

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Source: Dianik Bhaskar