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- The Shortage Of Specialists Will Be Addressed By Regular Recruitment, Not By Strict Bonds.
पंजाब के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करने हेतु सरकार ने पीजी मेडिकल कोर्स करने वाले डॉक्टरों हेतु सरकारी सेवा की अनिवार्यता बढ़ाई है। अब स्टेट कोटे के तहत पीजी करने वाले डॉक्टरों को कोर्स पूरा करने के पश्चात 3 वर्ष सरकारी अस्पतालों में सेवा देनी होगी। ऐसा न करने पर उन्हें 30 लाख रुपए का बाँड भरना होगा।
ऑल इंडिया कोटे के तहत पीजी करने वाले डॉक्टरों हेतु 2 वर्ष सरकारी सेवा और 20 लाख रुपए के बाँड का प्रावधान है। सरकार ने पीजी के पश्चात अनिवार्य सेवा की अवधि और बाँड राशि बढ़ाने का निर्णय विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के मकसद से लिया है। हालांकि, डॉक्टर संगठनों का तर्क है कि डॉक्टरों की कमी का समाधान नियमित भर्ती और सरकारी अस्पतालों में जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने से ही संभव है।
केवल बाँड की अवधि बढ़ाने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि डॉक्टर लंबे वक्त तक सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बने रहेंगे। मेडिकल कॉलेज अमृतसर की ओर से 3 नवंबर को अपनी वेबसाइट पर स्टेट कोटे की 40 प्रतिशत और ऑल इंडिया कोटे की 50 प्रतिशत पीजी सीटों हेतु नए बाँड प्रारूप अपलोड किए गए हैं। इस व्यवस्था के पीछे पंजाब के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बड़ी वजह है।
राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 2,098 स्वीकृत पदों में से लगभग 47 प्रतिशत पद खाली हैं। नियमित विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती 2022 के पश्चात नहीं होने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है। इसी कमी को देखते हुए स्वास्थ्य महकमा ने 78 पदों पर सेवानिवृत्त विशेषज्ञ डॉक्टरों को दोबारा नियुक्त करने हेतु आवेदन मांगे हैं।
सरकार के सामने चुनौती केवल मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सक तैयार करने की नहीं, बल्कि पीजी पूरी करने के पश्चात उनकी सेवाएं सरकारी अस्पतालों तक पहुंचाने की भी है। मार्च 2025 में सरकार ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पीजी पूरी करने वाले 255 डॉक्टरों को पंजाब के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में तैनात करने के आदेश जारी किए थे।
इनमें मेडिसिन, सर्जरी, स्त्री रोग, एनेस्थीसिया, हड्डी रोग और बाल रोग सहित अनेक विशेषज्ञताएं शामिल थीं। इससे स्पष्ट है कि बाँड के तहत डॉक्टरों की सेवाएं सरकारी अस्पतालों तक पहुंचाने की व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन मौजूदा रिक्त पदों के आंकड़े बताते हैं कि जरूरत अभी भी बड़ी है।
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Source: Dianik Bhaskar







