भास्कर न्यूज | अमृतसर दिवाली नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। वहीं, ढपई रोड पर कुम्हार परिवारों के घरों में चाक की रफ्तार भी तेज हो गई है। कहीं मिट्टी से दीये बनाए जा रहे हैं तो कहीं मटके और कलश तैयार हो रहे हैं। खुले आंगन में कच्चे दीये स

खर्च कम करने हेतु उन्हें दीयों का आकार छोटा करना पड़ रहा है। ढपई रोड पर दीये बनाने वाले राम प्रकाश, सुनैना और मंगल प्रजापति ने बताया कि दीये बनाना पूरे परिवार का काम है। अच्छी मिट्टी नगर के आसपास नहीं मिलती, इसलिए दूर से मंगवानी पड़ती है।

पहले मिट्टी की एक ट्रॉली 2500 रुपए में मिलती थी, लेकिन डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ने से अब इसकी कीमत 3500 रुपए हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक लाइटों का चलन बढ़ने के बाद भी पूजा-पाठ में मिट्टी के दीयों का महत्व कायम है। पंडित सोहन लाल शास्त्री के मुताबिक, लक्ष्मी पूजन के बीच मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं। प्रदोष काल में दीप प्रज्वलित करने की परंपरा निभाई जाती है। लक्ष्मी पूजन में कलश और घरों में नए घड़ों की भी मांग दीयों की डिमांड के साथ लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्तियों और बड़े दीयों की परंपरा बनी हुई है।

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लक्ष्मी पूजन में मिट्टी के कलश की जरूरत होती है। इसी डिमांड को देखते हुए ढपई रोड व झब्बाल रोड पर दीयों के साथ छोटे मिट्टी के मटके तैयार किए जा रहे हैं। नगर और गांवों में 30 लाख से ज्यादा दीयों की खपत ढपई में दीये बनाने वाले अमित कुमार के अनुसार, गुरु नगरी और आसपास के क्षेत्रों की 15 लाख आबादी में तेल के दीये जलाने की परंपरा है। हर परिवार अपनी परंपरा के मुताबिक एक से 5 दर्जन तक दीये खरीदता है। इसके चलते शहर और गांवों में 30 लाख से ज्यादा दीयों की खपत होने का अनुमान है। वहीं, पूरे जिले मेंब 50 लाख दीयों का उत्पादन होता है। दीये सहेजता बच्चा।

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Source: Dianik Bhaskar