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इस साल मानसून कमजोर रहेगा, अल नीनो का असर: करीब 80 सेमी बारिश का अनुमान, सीजन के आखिर में थोड़ी राहत मिल सकती है

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इस साल मानसून कमजोर रहेगा, अल नीनो का असर:  करीब 80 सेमी बारिश का अनुमान, सीजन के आखिर में थोड़ी राहत मिल सकती है


नई दिल्ली1 मिनट पहले

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इस साल मानसून में बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, मानसून सीजन के दौरान देश में करीब 80 सेंटीमीटर बारिश हो सकती है, जबकि 1971-2020 के आधार पर औसत बारिश करीब 87 सेंटीमीटर मानी जाती है।

IMD ने पिछले आठ साल में पहली बार मानसून के सामान्य से कम रहने की बात कही है। लद्दाख, पूर्वोत्तर राज्यों, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश के मध्य हिस्सों, दक्षिण ओडिशा, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु को छोड़कर देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है।

IMD के डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉ. एम. मोहापात्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस साल देश में कुल बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का करीब 92% रहने का अनुमान है, जिसे सामान्य से कम कैटेगरी में रखा गया है।

वहीं, दक्षिण-पश्चिम मानसून 1 जून के आसपास केरल तट पर पहुंच सकता है। इसके बाद यह आगे बढ़ते हुए भोपाल सहित मध्य भारत में 15 से 20 जून के बीच दस्तक देगा।

अल नीनो से मानसून में हल्की देरी संभव

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, जून के आसपास अल नीनो की स्थिति विकसित हो सकती है। यह आमतौर पर भारत में मानसून को कमजोर करता है, जिससे बारिश में कमी और ब्रेक की स्थिति बन सकती है।

1951 के बाद से अब तक 16 बार अल नीनो की स्थिति बनी है। इनमें से 10 बार देश में सामान्य से कम या कमजोर बारिश दर्ज की गई, जबकि सिर्फ 6 मौकों पर यह पैटर्न अलग रहा।

हालांकि, सीजन के आखिर (सितंबर) में इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के पॉजिटिव फेज में आने की संभावना है। यह स्थिति आमतौर पर बारिश को बढ़ाती है, जिससे अल नीनो के असर की कुछ भरपाई हो सकती है।

अल नीनो और ला नीना क्लाइमेट (जलवायु) के दो पैटर्न होते हैं-

अल नीनो: इसमें समुद्र का तापमान 3 से 4 डिग्री बढ़ जाता है। इसका प्रभाव 10 साल में दो बार होता है। इसके प्रभाव से ज्यादा बारिश वाले क्षेत्र में कम और कम बारिश वाले क्षेत्र में ज्यादा बारिश होती है।

ला नीना: इसमें समुद्र का पानी तेजी से ठंडा होता है। इसका दुनियाभर के मौसम पर असर पड़ता है। आसमान में बादल छाते हैं और अच्छी बारिश होती है।

पिछले साल 8 दिन पहले आया था मानसून

पिछले साल मानसून तय समय से 8 दिन पहले यानी 24 मई को ही केरल पहुंच गया था। मानसून केरल से आगे बढ़ते हुए महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आमतौर पर मध्य जून तक पहुंचता है। 11 जून तक मुंबई और 8 जुलाई तक पूरे देश में फैल जाता है।

इसकी वापसी उत्तर-पश्चिम भारत से 17 सितंबर को शुरू होती है और यह पूरी तरह 15 अक्टूबर तक लौट जाता है। अल नीनो इफेक्ट की वजह से मानसून में देरी हो सकती है। हालांकि सीजन के आखिर में थोड़ी राहत मिल सकती है।

IMD के आंकड़ों के मुताबिक, बीते 150 साल में मानसून के केरल पहुंचने की तारीखें अलग-अलग रही हैं। 1918 में मानसून सबसे पहले 11 मई को केरल पहुंच गया था, जबकि 1972 में सबसे देरी से 18 जून को केरल पहुंचा था।

आम आदमी के लिए 9 बड़ी बातें…

  • देश में कुल बारिश का करीब 75% हिस्सा मानसून के दौरान होता है, जो सिंचाई, पीने के पानी और बिजली उत्पादन के लिए बेहद जरूरी है।
  • करीब 64% आबादी कृषि पर निर्भर है। सिर्फ 55% खेती योग्य जमीन ही सिंचाई से कवर है।
  • कम बारिश का असर खरीफ सीजन की बुवाई, फसल उत्पादन और कुल कृषि गतिविधियों पर पड़ेगा, जिससे किसानों की लागत और जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं।
  • बारिश कम होने से उत्पादन घट सकता है, जिसका असर सप्लाई पर पड़ेगा और इससे सब्जियों, दालों सहित खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
  • खेती कमजोर रहने पर गांवों में आय कम हो सकती है, जिससे ग्रामीण बाजार में खर्च और मांग दोनों प्रभावित होंगे।
  • ग्रामीण मांग में कमी आने पर ट्रैक्टर और टू-व्हीलर जैसे वाहनों की बिक्री पर भी असर पड़ने की संभावना है।
  • अगर बारिश कम रहती है तो डैम और जलाशयों का जलस्तर सामान्य से नीचे रह सकता है, जिससे आगे चलकर पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
  • कम बारिश और ज्यादा गर्मी की स्थिति में बिजली की खपत बढ़ेगी, खासकर उन क्षेत्रों में जहां तापमान ज्यादा रहता है।
  • IMD मानसून को लेकर मई के आखिरी सप्ताह में दूसरा और ज्यादा विस्तृत पूर्वानुमान जारी करेगा, जिससे स्थिति और साफ होगी।

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