चंडीगढ़ का इंटरनेशनल प्लेयर नशे में कैसे फंसा: बर्थडे पार्टी में पहली बार चिट्टा पिया; गुरदासपुर का युवक फेयरवेल पार्टी में बीयर से फंसा – Ludhiana News

चंडीगढ़ का इंटरनेशनल प्लेयर नशे में कैसे फंसा:  बर्थडे पार्टी में पहली बार चिट्टा पिया; गुरदासपुर का युवक फेयरवेल पार्टी में बीयर से फंसा – Ludhiana News




चंडीगढ़ के इंटरनेशनल स्नूकर खिलाड़ी मेहुल और गुरदासपुर के पंकज महाजन को नशे ने अपने आगोश में ऐसा लिया कि उनकी जिंदगी नर्क में तब्दील हो गई। नशे की एक डोज के लिए इन दोनों ने अपनी पूरी जिंदगी, परिवार और करियर दांव पर लगा दिया था। एक ने नशे की शुरुआत अपनी बर्थडे पार्टी पर दोस्तों के साथ की जबकि दूसरे ने स्कूल की फेयरवेल पार्टी के दौरान नशे का पहला सुट्‌टा लगाया। बस यहीं से नशे की शुरुआत हुई। नसों में दौड़ते जहर ने इन्हें इस कदर लाचार कर दिया था कि एक वक्त दोनों मौत के बिल्कुल मुहाने पर खड़े थे। आज, इन्होंने न सिर्फ नशे को हराया है, बल्कि वे पंजाब सरकार के नशा मुक्ति अभियान के ब्रॉन्ड एंबेस्डर बन चुके हैं। हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री (CM) ने खुद इन दोनों युवाओं को उनकी इस अदम्य इच्छाशक्ति और नशे के खिलाफ ऐतिहासिक जीत के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया है। इन दोनों युवाओं के नर्क से लेकर सम्मान तक का सफर जानने के लिए पढ़िए पूरी रिपोर्ट… 4 पॉइंट में पढ़िए, इंटरनेशनल प्लेयर रहे मेहुल की कहानी:- 1. दोस्तों ने पार्टी में लगवाया था पहला सुट्‌टा
चंडीगढ़ के रहने वाले मेहुल एक प्रतिभावान इंटरनेशनल स्नूकर खिलाड़ी रहे हैं, जिन्होंने दुनिया के 8 अलग-अलग देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और तिरंगे का मान बढ़ाया। खेल की दुनिया में चमकता यह सितारा साल 2018 में अचानक एक गहरे अंधेरे में खो गया। 2018 में मेहुल का जन्मदिन था। दोस्तों ने मिलकर एक शानदार पार्टी रखी थी। इसी पार्टी के दौरान दोस्तों ने मेहुल के सामने ‘चिट्टा’ (हेरोइन/सिंथेटिक ड्रग्स) पेश किया। दोस्तों ने चांदी की पन्नी (फॉइल पेपर) पर ड्रग्स रखकर उन्हें पहली बार इसका सुट्टा लगाने को कहा। मेहुल को उस वक्त लगा कि यह शराब या सिगरेट जैसा ही कोई आम नशा है, जिसे सिर्फ आज के दिन मजे के लिए लिया जा सकता है। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि जन्मदिन का यह ‘गिफ्ट’ उनकी जिंदगी को नर्क बनाने वाला है। 2. नशे के लिए पैसों का इंतजाम करना था लक्ष्य
एक बार के मजे के बाद मेहुल कब इसके चंगुल में फंस गए, उन्हें खुद पता नहीं चला। स्नूकर टेबल पर सटीक शॉट लगाने वाले मेहुल के हाथ अब नशे के लिए कांपने लगे थे। यह लत इस कदर हावी हुई कि वे खेल और करियर भूलकर दिन-रात सिर्फ नशे के इंतजाम में जुट गए। जब उनके तथाकथित दोस्तों को पता चला कि मेहुल पूरी तरह एडिक्ट हो चुके हैं और उनके पास पैसे हैं, तो उन्होंने मेहुल का आर्थिक शोषण करना शुरू कर दिया। दोस्त मेहुल को अपने साथ रखते ताकि उनके पैसों से खुद का भी मुफ्त का नशा पानी चल सके। 3. छह साल तक फंसा रहा नशे की गर्त में
6 साल तक मेहुल नशे के इस खौफनाक चक्रव्यूह में फंसे रहे। इस दौरान उनका शरीर पूरी तरह खोखला हो गया। एक खिलाड़ी जिसका शरीर फिट होना चाहिए था, उसका वजन घटकर महज 50 किलो रह गया। सिर के बाल तेजी से झड़ने लगे और उनकी हालत किसी कैंसर के गंभीर मरीज जैसी हो गई, जिसकी कीमोथेरेपी चल रही हो। एक दिन नशे की अत्यधिक खुराक (ओवरडोज) के कारण मेहुल वॉशरूम में ही गिर गए। उनके मुंह से सफेद झाग निकल रहा था और वे मौत के बेहद करीब थे। तभी उनकी मां ने उन्हें इस हालत में देख लिया। मां ने रोते-चीखते हुए उनके चेहरे पर पानी के तेज छींटे मारे और किसी तरह उनकी सांसें वापस आईं। इस हादसे के बाद मेहुल लगातार चार दिनों तक अस्पताल के बिस्तर पर बेसुध पड़े रहे। उनका शरीर इतना कमजोर हो चुका था कि होश आने के बाद भी वे अपने हाथों से खाना तक नहीं खा पा रहे थे। 4. मां ने कहा कहा कि अब मेरे पास कुछ नहीं बचा
मौत के मुंह से बाहर आने के बाद मेहुल को नशा मुक्ति केंद्र भेजा गया। वे कुल 15 महीने वहां रहे। लेकिन नशा छोड़ने का असली संकल्प केंद्र की दीवारों के पीछे नहीं, बल्कि एक मां के आंसुओं से पैदा हुआ। एक दिन जब मेहुल ने अपनी मां को अपने सामने बुरी तरह रोते और बेबसी में भीख मांगते देखा, तो वह अंदर से टूट गया। मां ने तंग आकर और टूटकर रोते हुए कहा, “अब मेरे पास कुछ नहीं बचा है, मैं तुझे इस हालत में और नहीं पाल सकती।” 24 साल के एक जवान बेटे के लिए मां की यह लाचारी और फटकार किसी बड़े झटके जैसी थी। मेहुल को समझ आ गया कि वे न सिर्फ खुद को, बल्कि अपनी मां को भी जिंदा मार रहे हैं। उसी पल उन्होंने ठान लिया कि चाहे जो हो जाए, वे अब इस जहर को हाथ नहीं लगाएंगे। आज मेहुल को नशा छोड़े हुए लगभग 2 साल हो चुके हैं। वे पूरी तरह से स्वस्थ हो चुके हैं, दोबारा स्नूकर की दुनिया में कदम रख रहे हैं और सबसे बड़ी बात, अब वे पंजाब सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर राज्य के अन्य युवाओं को इस लत से बाहर निकालने के मिशन में जुटे हैं। 3 पॉइंट में जानिए, पंकज की कहानी:- 1. फेयरवेल पार्टी से हुई थी नशे की शुरुआत
गुरदासपुर के रहने वाले पंकज महाजन के बर्बादी की कहानी साल 2017 से शुरू होती है। उस साल कॉलेज या दोस्तों की एक फेयरवेल पार्टी थी। युवाओं के बीच माहौल था, डीजे बज रहा था। पंकज ने शुरुआत बहुत ही सामान्य तरीके से ‘फ्रूट बीयर’ पीकर की। फ्रूट बीयर पीकर नाचने में मजा आया, तो कुछ ही देर में दोस्तों के उकसाने पर असली बियर टेबल पर आ गई। बियर का सुरूर चढ़ा तो बात कुछ ही दिनों में हार्ड लिकर यानी शराब तक पहुंच गई। शराब के नशे में जब होश कम होने लगे, तो दोस्तों के उसी ग्रुप ने पंकज का परिचय हेरोइन (चिट्टे) से कराया। साल 2017 में हेरोइन की कीमत करीब 800 रुपए प्रति ग्राम थी। शुरुआत में पंकज और उनके चार दोस्तों ने 200-200 रुपये आपस में मिलाकर पहली डोज खरीदी थी। उन्हें लगा कि यह सिर्फ पार्टी का हिस्सा है, लेकिन यही उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। 2. नशे के लिए चोरी तक करने लगा था
वह नशा जो महज 200 रुपए के कन्ट्रीब्यूशन से शुरू हुआ था, उसने पंकज को इस तरह जकड़ा कि उनका रोजाना का खर्च 8 हजार रुपए तक पहुंच गया। इतने पैसे जुटाने के लिए पंकज को झूठ, चोरी और हर वो गलत रास्ता अपनाना पड़ा जो एक ड्रग एडिक्ट अपनाता है। साल 2017 के अंत आते-आते पंकज की हालत जानवरों से भी बदतर हो चुकी थी। वे अब फॉइल पेपर की जगह सीधे नसों में इंजेक्शन लेने लगे थे। उन्होंने शरीर का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा—दोनों बाहें, जांघें, पैर, छाती और यहां तक कि प्राइवेट पार्ट्स में भी वे इंजेक्शन लगाने लगे। लगातार इंजेक्शन लगाने के कारण एक वक्त ऐसा आया जब उनके शरीर की तमाम नसें पूरी तरह डैमेज और ब्लॉक हो गईं। एक दिन पंकज नशे की भयंकर तड़प से तड़प रहे थे। उन्होंने पूरे शरीर में सुई चुभाने की कोशिश की, लेकिन कहीं भी नस नहीं मिली। इस हताशा, पागलपन और दर्द में पंकज ने अपने सामने मौजूद शीशे पर पूरी ताकत से अपना सिर दे मारा। शीशा चकनाचूर हो गया और उनके सिर से खून बहने लगा। रौंगटे खड़े कर देने वाली बात यह है कि खून देखकर पंकज को दर्द नहीं हुआ, बल्कि खुशी हुई कि चलो शरीर में कहीं तो खून दिख गया। इसके बाद उन्होंने एक खौफनाक कदम उठाया। उन्होंने गले में रस्सी बांधी, उसे जोर से खींचा ताकि गर्दन की नस फूल जाए, और सीधे गर्दन की नस में जहर का इंजेक्शन ठोक दिया। इसके बाद वे 4 घंटे तक उसी फर्श पर खून और गंदगी के बीच बेसुध तड़पते रहे। 3. नशा छोड़ने के लिए खुद को कमरे में बंद किया
पंकज की जिंदगी पूरी तरह नर्क बन चुकी थी। वे रोज तिल-तिल कर मर रहे थे। उनके भीतर इस दलदल से निकलने की छटपटाहट तो थी, लेकिन हिम्मत जवाब दे चुकी थी। वे आत्महत्या करना चाहते थे, पर उसमें भी नाकाम रहे। अंत में, एक दिन उन्होंने एक आत्मघाती फैसला कर लिया। पंकज ने बिना किसी डॉक्टर या दवा की मदद के, खुद को एक अंधेरे कमरे में पूरी तरह बंद कर लिया। उन्होंने मन में सोच लिया था कि “अगर इस जहर से मरना ही है, तो अब बिना नशे के तड़प-तड़प कर इसी कमरे में मरूंगा, लेकिन बाहर नहीं जाऊंगा।” बिना नशे से तड़पते हुए वे दर्द से चीखते, दीवारों पर सिर मारते, उल्टी करते और फर्श पर रेंगते रहे, लेकिन उन्होंने कमरे का दरवाजा नहीं खोला। लगभग 20 से 21 दिनों की प्रताड़ना और तड़प झेलने के बाद जब पंकज उस कमरे से बाहर आए, तो उनकी रगों से जहर का असर काफी हद तक कम हो चुका था। हालांकि, मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह पटरी पर लौटने में उन्हें पूरा एक साल लग गया। लेकिन उनकी जिद काम कर गई। आज पंकज का बिखरा हुआ परिवार फिर से बस चुका है, वे एक सामान्य और खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। ——— ये खबर भी पढ़ें… जालंधर में एक गाली के बदले दोस्त की हत्या, पहले शराब पिलाई, फिर गला काट दफनाया जालंधर कैंट में हुए गुरप्रीत सिंह कत्ल मामले में जहां नए खुलासे हुए हैं, वहीं पुलिस की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में आ गई है। 26 जून को गुरप्रीत सिंह की कैंट एरिया में ही कूड़े के डंप में 10 फीट गहरे गड्ढे में दफानाई लाश मिली। DJ का काम करने वाला 22 साल का गुरप्रीत और जेसीबी ऑपरेटर रवि करीब 6 साल से दोस्त थे। (पढ़ें पूरी खबर)



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